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हिन्दी पत्रकारिता का प्रथम सूर्य उदन्त मार्तण्ड

 ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ 

आज भारत में मुख्य धारा के मीडिया में हिंदी पत्रकारिता का स्थान सबसे आगे है, लेकिन जब देश में पत्रकारिता की शुरुआत हुई, तब ऐसा नहीं था। पहले भारतीय पत्रकारिता में अंग्रेजी का बोलबाला था। दरअसल, हिंदी पत्रकारिता का जन्म सत्ता के प्रतिरोध से हुआ था। आज हिंदी पत्रकारिता का जो स्वरूप है, वह प्रतिरोध की इसकी लंबी विरासत का ही परिणाम है।

भारत में पत्रकारिता की नींव साल 1780 में शुरू हुए अंग्रेजी पत्र ‘बंगाल गजट’ से ही रखी जा चुकी थी। अंग्रेजी में जैसे-जैसे समाचार पत्रों का बोलबाला बढ़ा, बंगाली और उर्दू भाषा में भी अखबार प्रकाशित होने लगे। उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी और इसलिए पत्रकारिता का गढ़ भी बंगाल बना। दरअसल, बंगाल नवजागरण और बौद्धिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभर रहा था।

अब पूरे देश में समाचार पत्रों का प्रसार होने लगा था, फिर भी देश का एक भाग इससे अछूता था। यह था हिंदी भाषी उत्तर भारत। वैसे तो उस समय तक हिंदी का कोई ठोस स्वरूप नहीं उभर पाया था। हिंदी उस समय बहुत-सी क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को मिला-जुलाकर बोली जाती थी। हिंदी के लिखित स्वरूप का निर्धारण भी ढंग से नहीं हो सका था। उस समय हिंदी के टाइप मिलने में भी बड़ी कठिनाई थी।

साल 1820 में कलकत्ता स्कूल बुक ने प्रिंटिंग का काम शुरू किया। यहाँ से एक मैगजीन निकली, जिसका नाम था ‘समाचार दर्पण’। वैसे तो यह पत्रिका बंगाली भाषा में निकलती थी, लेकिन इसका कुछ भाग हिंदी में भी छपता था। मतलब कि अब देवनागरी लिपि का टाइप मिलना बहुत मुश्किल नहीं रहा। फिर भी हिंदी के समाचार पत्र को अस्तित्व में आने में 6 साल और लगे। हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ पं. युगल किशोर शुक्ल ने निकाला। पं. युगल किशोर शुक्ल मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले थे और पेशे से वकील थे। वह कलकत्ता में ही बस गए थे। उन्होंने जब देखा कि अख़बारों और पत्रिकाओं से लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और इसके जरिए ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना संभव है, तो उन्होंने भी उत्तर भारत में सामाजिक-राजनीतिक चेतना के जागरण के लिए हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत करने का बीड़ा उठाया।

उदन्त मार्तण्ड
साल 1826 के फरवरी महीने में शुक्ल जी को उनके एक साथी मुन्नू ठाकुर के साथ ‘हिंदी समाचार पत्र’ निकालने का लाइसेंस मिल गया। इसके बाद 30 मई, 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ समाचार पत्र का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इस तरह औपचारिक रूप से हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत हुई।

उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य‘। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिंदी के समाचार संसार में सूर्य के समान था। इस अख़बार के पहले अंक की 500 प्रतियां छापी गई थीं। इसका प्रकाशन उन हिन्दुस्तानियों के हित के लिए किया गया था जो अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और उर्दू जैसी भाषाएँ नहीं समझ सकते थे।

‘उदन्त मार्तण्ड’ से जुड़ी कुछ खास बातें :

यह साप्ताहिक पत्र हर मंगलवार को प्रकाशित होता था।
पुस्तकाकार (12×8) छपने वाले इस पत्र की भाषा खड़ी बोली और ब्रज भाषा का मिश्रित रूप थी।
यह पत्र कलकत्ता के कोलू टोला मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से निकलता था।
इसके सिर्फ 79 अंक ही प्रकाशित हुए।
इस पत्र से शुक्ल और ठाकुर को बहुत आशाएं थीं। इसके माध्यम से वे आम हिन्दुस्तानियों के हितों को सबके समक्ष रखना चाहते थे। पर यह समाचार पत्र सिर्फ एक सालगिरह ही मना पाया और फिर बंद हो गया। इसके बंद होने के लिए बहुत से कारण जिम्मेवार रहे।

सबसे पहले तो अंग्रेजी सरकार ने जिस तरह से अंग्रेजी समाचार पत्रों को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, वैसी सुविधा बार-बार अनुरोध करने पर भी ‘उदन्त मार्तण्ड’ को नहीं मिली। दूसरी समस्या थी कि यह पत्र हिंदी भाषी इलाकों से कोसों दूर कलकत्ता से निकाला जा रहा था। ऐसे में, न तो इस पत्र को ज्यादा पाठक मिले और न ही सही पाठकों तक यह पहुँच पाया।

इससे प्रकाशन का खर्च चलाना नामुमकिन हो गया और 19 दिसंबर, 1827 को युगल किशोर शुक्ल को उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन बंद करना पड़ा। उदन्त मार्तण्ड के अंतिम अंक में एक नोट प्रकाशित हुआ था, जिसमें इसके बंद होने की पीड़ा झलकती है। वह इस प्रकार था,

“आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तण्ड उदन्त।

अस्ताचल को जाता है दिनकर दिन अब अंत।।”

भले ही ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बंद हो गया, लेकिन यह समाचार पत्र हिंदी पत्रकारिता की नींव जमा चूका था। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रथम प्रकाशन के दिन, 30 मई को हर साल भारत में ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। इसके दो साल बाद ही, राजा राम मोहन राय के नेतृत्व में ‘बंगदूत’ की शुरुआत हुई। यह पत्र हिंदी के साथ-साथ बांग्ला और फारसी में भी छपता था। पर इसके हिंदी अंक को भी बहुत सराहना मिली और फिर कभी भी हिंदी पत्रकारिता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 

-साभार

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