राम नवमी यज्ञ महोत्सव (चौथा दिन) : ब्रह्म पद सर्वोच्च पद है – सजन जी

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फरीदाबाद। रामनवमी की पवित्र बेला पर आज सतयुग दर्शन वसुंधरा के प्रांगण में हवन आयोजन के उपरांत कई नवजात शिशुओं ने चोले डलवाएउनका नामकरण हुआ व मुण्डन संस्कार सम्पन्न हुआ। आज सफ़ेद पोशाक व गुलानारी दुपट्‌टा धारे श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ थी। आज यहाँ अनमोल मानव जीवन के परमपद को समयानुसार प्राप्त कर लेने की महत्ता पर बल देते हुए श्री सजन जी ने कहा ब्रह्म पद सर्वोच्च पद है। इस पद की प्राप्ति प्रत्येक मानव जीवन का सर्वप्रथम व अंतिम लक्ष्य है। अत: निष्काम भाव से इस पद की प्राप्ति हेतुअविचार छोड़विचारयुक्त सवलडा रास्ता अपनाओ यानि ब्रह्म विचार पकड़ो और सर्व सर्व्‌ उस ब्रह्म के व्याप्त होने का सत्य दिल से स्वीकारो। जानो इस वृत्ति में ढलना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि सतवस्तु का कुदरती ग्रन्थ कह रहा है:-

 

ब्रह्म नाम ब्रह्म ध्यान है बेटाहां हां हां ब्रह्म वचन करो प्रवान बेटा

ब्रह्म विचार नूं फड़न सजनफिर ब्रह्म है बड़ा महान बेटा

अर्थात्‌ ध्याने योग्य ब्रह्म ही सत्‌ नाम है। ब्रह्म ही आत्मबोध कराने वाला शब्द है तथा ब्रह्म ही ध्यान यानि मानस अनुभूति या प्रत्यक्ष है। अत: एकाग्रचित्त होकर ध्याने योग्य इस सत्‌ नाम/शब्द ब्रह्म से उद्धृत व हृदय विहित्‌ ब्रह्म वाणी प्रवान करो यानि मनन एवं चिंतन द्वारा अमल में लाओ और ए विध्‌ ब्रह्म विचारों को पकड़ कर यानि अपने स्वभाव या वृत्ति के अंतर्गत करके सर्व महान ब्रह्म पद को प्राप्त करो। जानो ऐसा करने से मन को अपार आत्मसंतोष प्राप्त होगाचित्त शांत होगावृत्ति-स्मृतिबुद्धि व भाव-स्वभाव निर्मल होंगे तथा निर्गुण आत्मतत्व यानि दिव्य ज्ञान रूप आद्‌ ज्योति का अपने मन मन्दिर में साक्षात्कार होगा। ऐसा होने पर शास्त्र अनुसार फिर क्या करना हैवह ध्यान से सुनो:-

जेहड़ा है मन मन्दिर प्रकाशहर अन्दर है उसे दा निवासउसे दा दर्शन कीजियो बेटा

अर्थात्‌ जो आत्मप्रकाश हमने अपने मन-मन्दिर में देखा हैहर किसी में उसी के व्याप्त होने का आभास करते हुएजनचरबनचरजड़-चेतन में अपने असलियत प्रकाश को देखना है और सतर्क रहना है कि सब कार्यव्यवहार करते हुए हमारा ख़्याल उसी प्रकाश में ठहरा रहे। ऐसा करने से मुस्कराहट आयेगीबदन प्रफुल्लित होगाहृदय खिड़ेगा और मुख चमकेगा। इस तरह सजनों जब अन्दर-बाहर दोनो वृतियों मेंआत्मप्रकाश पर परिपक्वता से खड़े हो समवृत्ति हो जाओगे तो उस प्रकाश में अपने असलियत ब्रह्म स्वरूप यानि ‘आत्मा में जो है परमात्मा‘ उस नित्य समरूप परब्रह्म परमेश्वर का बोध होगा और ज्ञात होगा कि यह जगत और कुछ नहीं अपितु एक ही अगोचर नित्य चेतन स्वरूप की नाना नाम रूपों में अभिव्यक्ति है। यही यथार्थ है व इसके अतिरिक्त और जो कुछ प्रतीत हो रहा है वे सब मायावी और मिथ्या है। ऐसा होने पर सहज ही शास्त्र अनुसार कह उठोगे:-

ब्रह्म स्वरूप है अपना आपहां-हां-हां-हां,, हम तो हैं सारा प्रकाश जग प्रकाश

ब्रह्म स्वरूप कुल इन्सानब्रह्म स्वरूप सारी सगली मान

इस बात को समझते हुए श्री सजन जी ने कहा कि विभिन्न रूपरंगरेखा से अलंकृत जो देहिक प्राणी हैंउनकी ओर से अपनी दृष्टि (ध्यान) हटाकर जो इस देह का आधारस्वरूप परमात्मा है यानि देहेश्वर है उसके साथ अपना ध्यान/दृष्टि जोड़ो अर्थात्‌:-

अनडिठी चीज़ को देखो‘

शरीरधारियों की ओर से दृष्टि हटाओ,

महाराज जी (ईश्वर) की ओर ध्यान (दृष्टि) जोड़ो।‘

शास्त्र कहता है ऐसा करने से आँखों की सफ़ाई होगी और दृष्टि विराट्‌ रूप हो जाएगी। इस तरह दृष्टि की मैल उतरने से आँखें उजली होंगीउजली होने पर लाईट आवेगी और आँखें चमक उठेंगी। दृष्टि चमक पड़ी तो चतुर्भुजधार का प्रकाश ही प्रकाश और वही चमत्कार सब सजनों में निगाह आवेगा। फिर जो प्रकाश हो उसे हृदय में ठहरा लेना है और इस तरह से शुद्ध रहकर उस ज्योति स्वरूप भगवानजिसने सजनों हमारी बनत बनाई है उस भगवान के साथ भगवान होकर जीवन सफ़ल बनाना है।  इस संदर्भ में शास्त्र भी कहता है:-

विराट्‌ पर जो खड़ा हो गया उसकी जीत-जीतफ़तह फ़तह

अंत में सजन जी ने कहा कि शास्त्र अनुसार याद रखो ‘संसार में सब काम करते हुए भी जो निष्कामी बना रहता हैवही ब्रह्म कहलाता है‘। अत: निष्काम रास्ता पकड़ो और परमतत्व का ज्ञान प्राप्त कर व विचार के साथ सब में ब्रह्म ही ब्रह्म का बोध करते हुए ब्रह्म पद पाने के सच्चे अधिकारी सिद्ध होवो। उन्होंने फिर सबसे कहा कि निश्चित ही यह सब समझने के पश्चात्‌ आपके मन में भी सजनता का प्रतीक बन ब्रह्म पद प्राप्त करने की इच्छा अवश्य ही जाग्रत हुई होगी। अगर ऐसा ही है तो एक दृढ़ संकल्पी इंसान की तरह सजन भाव अर्थात्‌ ब्रह्म भाव अनुरूप अपने भाव-स्वभावों को ढ़ालवैश्विक स्तर पर पुन: सत्य धर्म का परचम बुलंद कर दो। जानो यही अधर्म की हार व धर्म की जीत का प्रतीक होगा।

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