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फरीदाबाद | 05 फरवरी 2026

39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला-2026: सूरजकुंड मेले में दक्षिण भारत की चित्रकला का आकर्षण

फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों में आयोजित 39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला-2026 इन दिनों कला प्रेमियों और पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बना हुआ है। इस मेले में देश और विदेश की पारंपरिक कलाओं की झलक देखने को मिल रही है। इसी बीच दक्षिण भारत की प्रसिद्ध चित्रकला शैली ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा है।

सूरजकुंड मेले में तमिलनाडु से आए शिल्पकारों की कलाकृतियां बड़ी संख्या में प्रदर्शित की गई हैं। खास तौर पर तंजौर चित्रकला लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। इसकी बारीक कारीगरी और पारंपरिक स्वरूप मेले में आने वाले पर्यटकों को प्रभावित कर रहा है।

तंजौर पेंटिंग बनी विशेष आकर्षण

मेले के स्टॉल नंबर 917 पर तमिलनाडु से आए शिल्पकार केशव की तंजौर पेंटिंग्स दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। उनके स्टॉल पर अलग-अलग आकार और कीमत की पेंटिंग्स रखी गई हैं। इनकी कीमत 12 हजार रुपये से शुरू होकर 12 लाख रुपये तक है।

इन पेंटिंग्स में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली कलाकृति तिरुपति बालाजी की तंजौर पेंटिंग है। इसकी कीमत करीब 12 लाख रुपये बताई जा रही है। शुद्ध सोने की पन्नी और कीमती रत्नों से सजी यह पेंटिंग मेले की सबसे महंगी और भव्य कलाकृतियों में गिनी जा रही है।

बारीक कारीगरी और पारंपरिक तकनीक

शिल्पकार केशव ने बताया कि तंजौर चित्रकला तमिलनाडु की एक प्राचीन और प्रसिद्ध कला शैली है। इसका इतिहास 16वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। इस कला में शुद्ध सोने की पन्नी और कीमती रत्नों का उपयोग किया जाता है, जिससे चित्रों को विशेष चमक और गहराई मिलती है।

उन्होंने बताया कि ये पेंटिंग्स लकड़ी के मजबूत तख्तों पर बनाई जाती हैं। इनमें उभरी हुई नक्काशी की जाती है, जिससे चित्र त्रि-आयामी रूप में नजर आते हैं। यही कारण है कि तंजौर पेंटिंग्स अन्य चित्रकलाओं से अलग पहचान रखती हैं।

देवी-देवताओं की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति

तंजौर चित्रकला में मुख्य रूप से हिंदू देवी-देवताओं को दर्शाया जाता है। इन चित्रों में धार्मिक और आध्यात्मिक भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। रंगों का संतुलन, सोने की पन्नी की चमक और रत्नों की सजावट चित्रों को जीवंत बना देती है।

शिल्पकार के अनुसार, एक तंजौर पेंटिंग को तैयार करने में कई दिन लग जाते हैं। इसमें धैर्य, अनुभव और पारंपरिक ज्ञान की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि इस कला को आज भी खास सम्मान के साथ देखा जाता है।

पर्यटकों की बढ़ती रुचि

सूरजकुंड मेले में तंजौर पेंटिंग्स को देखने के लिए पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ रही है। स्टॉल नंबर 917 पर दिनभर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। कई लोग इन पेंटिंग्स की खूबसूरती को नजदीक से देखने के लिए समय निकाल रहे हैं।

पर्यटक न केवल तस्वीरें देख रहे हैं, बल्कि इस कला की प्रक्रिया को समझने में भी रुचि दिखा रहे हैं। शिल्पकार केशव खुद लोगों को तंजौर चित्रकला की तकनीक और इतिहास के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

भारतीय कला विरासत का जीवंत उदाहरण

39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला-2026 भारतीय कला और संस्कृति को करीब से देखने का अवसर दे रहा है। दक्षिण भारत की तंजौर चित्रकला इस मेले में भारतीय विरासत का जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है।

इस तरह की प्रदर्शनियां न केवल कलाकारों को मंच देती हैं, बल्कि नई पीढ़ी को पारंपरिक कलाओं से जोड़ने का काम भी करती हैं। सूरजकुंड मेला एक बार फिर साबित कर रहा है कि भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर आज भी लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रखती है।

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