दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ रही है, यह किसी से छिपा नहीं है।
बीसवीं सदी में राष्ट्रों की शक्ति युद्ध और भूगोल से तय होती थी।
लेकिन इक्कीसवीं सदी की ताक़त अब ज्ञान, विज्ञान और नवाचार से मापी जाती है।
रूस कैंसर जैसी घातक बीमारियों के इलाज पर बड़े पैमाने पर अनुसंधान में निवेश कर रहा है।
अमेरिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ज़रिए अर्थव्यवस्था और युद्धनीति तक को नया रूप दे चुका है।
वहीं, चीन ने तकनीकी शिक्षा और बुनियादी ढांचे में अनुशासन के साथ काम कर स्वयं को वैश्विक उत्पादन केंद्र बना लिया है।
‘विश्वगुरु’ का दावा और ज़मीनी हकीकत
इन्हीं वैश्विक प्रयासों के बीच भारत “विश्वगुरु” बनने का दावा करता है।
यह आकांक्षा स्वाभाविक है, क्योंकि हर राष्ट्र अपनी भूमिका को ऊँचाई देना चाहता है।
समस्या इस दावे में नहीं है।
असल समस्या उस गहराते अंतर में है, जो हमारे नारों और हमारी हकीकत के बीच लगातार बढ़ रहा है।
चिकित्सा शिक्षा और योग्यता का संकट
हाल के महीनों में चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े तथ्य चिंताजनक हैं।
यदि यह सच है कि नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी भी डॉक्टर बन रहे हैं, तो यह केवल शैक्षणिक चूक नहीं है।
यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा पर सीधा खतरा है।
डॉक्टर केवल एक पेशेवर नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच सेतु होता है।
उसकी योग्यता में गिरावट पूरे समाज की सुरक्षा पर प्रहार करती है।
डॉक्टरों की कमी का समाधान क्या यही है?
यह सच है कि भारत में डॉक्टरों की संख्या वैश्विक औसत से कम है।
लेकिन इस संकट का समाधान योग्यता की सीमा घटाकर नहीं किया जा सकता।
यह वैसा ही है जैसे पुलों की कमी दूर करने के लिए निर्माण सामग्री की गुणवत्ता घटा दी जाए।
पुल खड़ा तो हो जाएगा, लेकिन किसी दिन गिरकर जनता को ही नुकसान पहुँचाएगा।
सामाजिक न्याय बनाम पेशागत जिम्मेदारी
सामाजिक न्याय भारतीय लोकतंत्र का मूल मूल्य है।
आरक्षण और समावेशिता का उद्देश्य अवसरों की बराबरी है, न कि प्रतिभा की कसौटी को समाप्त करना।
सर्जन के हाथ में छुरी देते समय अंकों और दक्षता से समझौता आत्मघाती कदम होगा।
किसी छात्र का संघर्ष सहानुभूति योग्य हो सकता है,
लेकिन ऑपरेशन टेबल पर हुई गलती किसी की ज़िंदगी छीन सकती है।
इसीलिए चिकित्सा, विमानन और परमाणु विज्ञान जैसे क्षेत्रों में
रियायत नहीं, बल्कि बेहतर प्रशिक्षण और समर्थन की आवश्यकता होती है।
व्यंग्य के पीछे छिपा डर
आजकल एक व्यंग्य सुनने को मिलता है—
“जनसंख्या नियंत्रण का नया तरीका माइनस मार्क्स वाला डॉक्टर है।”
यह अतिशयोक्ति लग सकती है,
लेकिन इसके पीछे छिपा डर पूरी तरह वास्तविक है।
चिकित्सा में अयोग्यता का प्रवेश केवल नीति की विफलता नहीं,
बल्कि एक गंभीर नैतिक अपराध बन जाता है।
निजी कॉलेज और बाज़ारीकरण की समस्या
निजी चिकित्सा कॉलेजों के बढ़ते प्रभाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
जब शिक्षा सेवा नहीं, बल्कि कारोबार बन जाती है, तो योग्यता धन के नीचे दब जाती है।
ऊँची फीस, प्रबंधन कोटे और लेन-देन ने चिकित्सा शिक्षा का चरित्र बदल दिया है।
इसका सीधा असर डॉक्टर और रोगी के बीच विश्वास पर पड़ता है।
सबसे अधिक नुकसान किसे होता है?
विडंबना यह है कि जिन वर्गों के नाम पर ढील दी जाती है,
सबसे अधिक नुकसान भी वही वर्ग झेलता है।
गरीब और वंचित तबका सरकारी अस्पतालों पर निर्भर होता है।
यदि वहाँ अयोग्य चिकित्सक पहुँचेंगे,
तो सामाजिक न्याय का उद्देश्य ही उल्टा पड़ जाएगा।
समाधान: योग्यता का निर्माण, समझौता नहीं
इस स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है—
पूरे शैक्षणिक ढाँचे का पुनर्गठन।
प्रवेश मानक गिराने से नहीं,
बल्कि शिक्षा की नींव मज़बूत करने से समस्या सुलझेगी।
ग्रामीण और कमजोर छात्रों को प्रारंभिक स्तर पर
बेहतर शिक्षक, संसाधन और प्रशिक्षण देना होगा।
योग्यता पैदा करना कठिन है,
लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है।
विश्वगुरु बनने की असली शर्त
कोई भी देश नारों से महान नहीं बनता।
वह महान बनता है अपने संस्थानों की ईमानदारी और अनुशासन से।
डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक और इंजीनियर
किसी भी समाज की असली पहचान होते हैं।
यदि इनमें योग्यता का क्षरण शुरू हो जाए,
तो कोई भी विज़न डॉक्यूमेंट राष्ट्र को विश्वगुरु नहीं बना सकता।
आत्ममंथन का समय
भारत के सामने अब स्पष्ट प्रश्न है—
क्या हम नारों के गर्व में रहना चाहते हैं
या सचमुच वैश्विक गुणवत्ता का समाज बनना चाहते हैं?
उत्तर साफ है।
“विश्वगुरु” बनने से पहले,
हमें योग्यता को ही गुरु बनाना होगा।
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
ज्ञान से पवित्र कुछ नहीं।
यही विचार भारत को आगे ले जा सकता है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ,
पीएचडी (राजनीति विज्ञान),
कवि एवं सामाजिक विचारक)
