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फरीदाबाद में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत हालिया केंद्रीय बजट को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है। इसी क्रम में बल्लभगढ़ विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ नेता मनोज अग्रवाल तथा हरियाणा महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव प्रियंका अग्रवाल ने संयुक्त रूप से बजट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। दोनों नेताओं ने बजट को आमजन की अपेक्षाओं के अनुरूप न बताते हुए इसे निराशाजनक करार दिया और कहा कि इससे देश के विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक वर्गों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाई है।

उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट देश की आर्थिक स्थिति, रोजगार, महंगाई, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनता की उम्मीदों को पूरा करने में असफल रहा है। उनके अनुसार, बजट में जिन वर्गों को सबसे अधिक सहारे की आवश्यकता थी, उन्हें प्राथमिकता नहीं दी गई।


आर्थिक नीतियों पर उठाए गए सवाल

मनोज अग्रवाल ने कहा कि वर्तमान समय में देश एक कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है, जहां बेरोजगारी और महंगाई आम नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भारत एक युवा देश है, लेकिन बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

उनके अनुसार, बजट में रोजगार सृजन को लेकर कोई ठोस और प्रभावी रोडमैप सामने नहीं आया। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए जिन योजनाओं पर लोगों की निर्भरता रही है, उनके आवंटन और क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठते हैं।


ग्रामीण रोजगार और योजनाओं का उल्लेख

नेताओं ने ग्रामीण भारत की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, सड़क, आवास और बुनियादी ढांचे से जुड़ी योजनाएं देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। ऐसे में इन योजनाओं के लिए पर्याप्त बजटीय समर्थन आवश्यक है।

उनका कहना था कि—

  • ग्रामीण रोजगार योजनाओं का प्रभाव सीमित होता जा रहा है

  • आवास से जुड़ी योजनाओं में लक्ष्यों और वास्तविक उपलब्धियों के बीच अंतर दिखाई देता है

  • ग्रामीण सड़कों और कौशल विकास कार्यक्रमों की प्रगति को लेकर भी संतोषजनक स्थिति नहीं है

उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना समग्र आर्थिक विकास की कल्पना करना कठिन है।


महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर प्रतिक्रिया

महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव प्रियंका अग्रवाल ने बजट में महिलाओं से जुड़े प्रावधानों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण को लेकर किए गए दावों और जमीनी प्रावधानों के बीच अंतर महसूस होता है।

उन्होंने कहा कि—

  • महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े बजट में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं दिखती

  • कार्यरत और ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और सुरक्षा से जुड़े उपायों को और मजबूत करने की आवश्यकता है

उनका कहना था कि महिला सशक्तिकरण केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और संसाधनों से संभव होता है।


शिक्षा और स्वास्थ्य बजट पर चर्चा

नेताओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों के बजट पर भी अपनी बात रखी। उनका कहना था कि किसी भी देश की दीर्घकालिक प्रगति के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य में निरंतर निवेश जरूरी होता है।

उन्होंने कहा कि—

  • शिक्षा क्षेत्र में संसाधनों की कमी का सीधा असर भविष्य की कार्यशक्ति पर पड़ता है

  • स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश से आम नागरिकों का जीवन स्तर बेहतर होता है

उनके अनुसार, इन क्षेत्रों में और अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, ताकि समाज के सभी वर्गों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं मिल सकें।


आर्थिक असमानता और महंगाई का मुद्दा

मनोज अग्रवाल ने कहा कि देश में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि एक ओर महंगाई आम आदमी की क्रय शक्ति को प्रभावित कर रही है, वहीं दूसरी ओर आय में असमानता सामाजिक संतुलन के लिए चुनौती बनती जा रही है।

उनका कहना था कि—

  • रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें आम परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही हैं

  • मध्यम और निम्न आय वर्ग के लिए राहत के उपाय सीमित दिखाई देते हैं

उन्होंने यह भी कहा कि बजट में ऐसे कदमों की अपेक्षा थी, जो आम नागरिक को सीधे राहत पहुंचा सकें।


युवाओं और बेरोजगारी पर चिंता

नेताओं ने युवाओं की स्थिति पर भी विशेष रूप से चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवाओं का है और यदि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो इसका असर सामाजिक और आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि—

  • कौशल विकास योजनाओं को जमीनी स्तर पर और प्रभावी बनाने की जरूरत है

  • निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक नीति आवश्यक है

उनके अनुसार, बजट में इस दिशा में अपेक्षित स्पष्टता नहीं दिखती।


आर्थिक संकेतकों पर चर्चा

संयुक्त बयान में नेताओं ने देश की आर्थिक स्थिति से जुड़े कुछ संकेतकों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि—

  • मुद्रा विनिमय दर

  • विदेशी मुद्रा भंडार

  • औद्योगिक निवेश का रुझान

जैसे पहलुओं पर निरंतर निगरानी और संतुलित नीति की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए व्यापक और समावेशी रणनीति जरूरी है।


सामाजिक सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा का विषय

नेताओं ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उनका कहना था कि सामाजिक सुरक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी पात्र व्यक्ति बुनियादी सुविधाओं से वंचित न रहे।

उन्होंने कहा कि—

  • जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों का अद्यतन होना नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है

  • पात्र लोगों तक योजनाओं का लाभ पहुंचना प्राथमिकता होनी चाहिए

उनके अनुसार, इस दिशा में प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर सुधार की गुंजाइश बनी हुई है।


बजट को लेकर आमजन की अपेक्षाएं

नेताओं ने कहा कि बजट के समय आम नागरिक बड़ी उम्मीदों के साथ घोषणाओं को सुनता है। रोजगार, महंगाई से राहत, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे हर परिवार के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं।

उनका कहना था कि इस बार भी आमजन को राहत की अपेक्षा थी, लेकिन कई क्षेत्रों में वे अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में बजट पर अलग-अलग दृष्टिकोण और प्रतिक्रियाएं आना स्वाभाविक है।


राजनीतिक प्रतिक्रिया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया

संयुक्त बयान में यह भी कहा गया कि बजट पर आलोचना और समर्थन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन अपने-अपने दृष्टिकोण से बजट का मूल्यांकन करते हैं।

नेताओं ने कहा कि उनका उद्देश्य मुद्दों को सामने लाना और जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा को आगे बढ़ाना है, ताकि नीतियों में सुधार की संभावना बन सके।

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