फरीदाबाद | 03 फरवरी 2026
हरियाणा के प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजन सूरजकुंड में आयोजित 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला–2026 अपने तीसरे दिन एक विशेष आध्यात्मिक वातावरण में नजर आया। दिनभर शिल्प, हस्तकला और व्यंजनों की चहल-पहल के बाद शाम ढलते ही मेला परिसर भक्ति संगीत से गूंज उठा। मुख्य चौपाल पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में सुप्रसिद्ध भजन गायक हेमंत बृजवासी की प्रस्तुति ने दर्शकों को भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ दिया।
जैसे ही हेमंत बृजवासी मंच पर पहुंचे, पंडाल में मौजूद दर्शकों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया। भक्ति गीतों की यह संध्या मनोरंजन से आगे बढ़कर एक ऐसा अनुभव बन गई, जहां संगीत, श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता एक साथ देखने को मिली।
भक्ति संगीत से सजी सांस्कृतिक संध्या
सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत “जय राधे-राधे” के जयकारों से हुई, जिसने पूरे मेला परिसर में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर दिया। इसके बाद हेमंत बृजवासी ने “किशोरी कुछ ऐसा इंतजाम”, “दीवाना राधे का” और “जुबां पे राधा राधा” जैसे लोकप्रिय भजनों की प्रस्तुति दी।
इन भजनों के दौरान मुख्य चौपाल में मौजूद श्रद्धालु दो अलग-अलग भावों में नजर आए—कुछ दर्शक मंच के सामने खड़े होकर भजनों पर झूमते रहे, जबकि कई लोग शांत भाव से बैठकर संगीत और शब्दों में छिपे आध्यात्मिक संदेश का आनंद लेते दिखाई दिए। भक्ति संगीत की यह विविधता इस कार्यक्रम की खास पहचान रही।
संगीत, रोशनी और माहौल का संतुलन
कार्यक्रम के दौरान मंच की रोशनी और साउंड सिस्टम ने भजनों के प्रभाव को और अधिक गहरा बना दिया। धीमी रोशनी, नियंत्रित ध्वनि और भावपूर्ण गायकी ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया, जिसमें दर्शक खुद को दैनिक व्यस्तताओं से अलग कर भक्ति के रंग में डूबते महसूस कर रहे थे।
कई दर्शकों का कहना था कि यह संध्या केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने उन्हें मानसिक शांति और सुकून का अहसास कराया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी लोग एक-दूसरे से भजनों की चर्चा करते और हेमंत बृजवासी की प्रस्तुति की सराहना करते नजर आए।
दिन की हलचल के बाद शाम की भक्ति
सूरजकुंड मेले का तीसरा दिन सुबह से ही पर्यटकों की भीड़, खरीदारी और सांस्कृतिक गतिविधियों से भरा रहा। दिन में शिल्पकारों के स्टॉल, हस्तनिर्मित उत्पाद और विभिन्न राज्यों की झलक देखने के बाद शाम होते-होते मेला परिसर का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।
जैसे ही भक्ति संध्या शुरू हुई, परिवारों, मित्रों और पर्यटकों का रुख मुख्य चौपाल की ओर हो गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी आयु वर्ग के लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए। भक्ति संगीत ने पीढ़ियों के बीच एक साझा अनुभव तैयार किया, जहां सभी एक साथ श्रद्धा और संगीत के माध्यम से जुड़े नजर आए।
भजनों में झलकी सांस्कृतिक विरासत
हेमंत बृजवासी की गायकी की खासियत यह रही कि उनके भजनों में केवल धार्मिक भाव ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी स्पष्ट दिखाई दी। उनके गीतों में ब्रज संस्कृति, लोकभाव और पारंपरिक संगीत शैली का संतुलन देखने को मिला।
“काली कमली वाले” और “दीवाना राधे का” जैसे भजनों ने श्रोताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया। कई श्रद्धालु इन गीतों के दौरान आंखें बंद कर संगीत में डूबे नजर आए, जो यह दर्शाता है कि कार्यक्रम ने केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभूति का भी अवसर दिया।
दर्शकों की प्रतिक्रिया
कार्यक्रम में शामिल कई दर्शकों ने बताया कि सूरजकुंड मेले में आने का उनका उद्देश्य केवल खरीदारी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक सुकून पाना भी है। भक्ति संध्या ने इस अपेक्षा को पूरा किया।
कुछ पर्यटकों ने कहा कि दिनभर की भागदौड़ और भीड़ के बाद यह संध्या उनके लिए एक तरह की “मानसिक विश्रांति” बन गई। वहीं स्थानीय लोगों का मानना था कि ऐसे कार्यक्रम मेले की पहचान को और मजबूत करते हैं, क्योंकि इससे मेला केवल व्यापारिक आयोजन न रहकर सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले लेता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की निरंतरता
यह उल्लेखनीय है कि 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेला–2026 केवल एक दिन या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। मेला परिसर में 15 फरवरी तक प्रतिदिन मुख्य चौपाल, छोटी चौपाल और महा चौपाल पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं।
इन कार्यक्रमों में देश-विदेश के कलाकार अपनी-अपनी कला और संगीत के माध्यम से दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं। शास्त्रीय संगीत, लोकनृत्य, भक्ति संगीत और आधुनिक प्रस्तुतियों का यह मिश्रण सूरजकुंड मेले को एक बहुआयामी सांस्कृतिक मंच बनाता है।
कला और संस्कृति का साझा मंच
हरियाणा पर्यटन निगम और कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग हरियाणा द्वारा आयोजित ये सांस्कृतिक संध्याएं मेले की आत्मा मानी जाती हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं को एक मंच पर लाना भी है।
भक्ति संध्या जैसे कार्यक्रम यह दिखाते हैं कि भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक संगीत का आज भी विशेष स्थान है और बड़ी संख्या में लोग ऐसे आयोजनों से जुड़ना पसंद करते हैं।
पर्यटन और सांस्कृतिक अनुभव
सूरजकुंड मेला हर वर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस तरह की सांस्कृतिक संध्याएं पर्यटकों के अनुभव को और समृद्ध बनाती हैं। दिन में जहां लोग शिल्प और खरीदारी का आनंद लेते हैं, वहीं शाम को संगीत और कला के माध्यम से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजन स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यटन को भी मजबूती देते हैं, क्योंकि पर्यटक केवल देखने नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आते हैं।
तीसरे दिन की संध्या बनी यादगार
39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेले के तीसरे दिन आयोजित यह भक्ति संध्या दर्शकों के लिए एक यादगार अनुभव बनकर सामने आई। हेमंत बृजवासी की गायकी, दर्शकों की सहभागिता और संपूर्ण वातावरण ने इस शाम को विशेष बना दिया।
कार्यक्रम ने यह साबित किया कि संगीत, विशेषकर भक्ति संगीत, आज भी लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने की क्षमता रखता है। सूरजकुंड मेले की यह संध्या लंबे समय तक दर्शकों की स्मृतियों में बनी रहने वाली मानी जा रही है।

