भगवान महावीर जयंती पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन होगा- अजीत पटवा जैन
फरीदाबाद। महावीर इंटरनेशनल सोशल फाऊंडेशन के नेहरू ग्राऊंड स्थित कार्यालय पर एक बैठक का आयोजन किया गया। जिसमें आगामी 31 मार्च को भगवान महावीर जन्म कल्याणक दिवस मनाने को लेकर विचार विर्मश किया गया। महावीर इंटरनेशनल सोशल फाऊंडेशन के सरंक्षक वीर अजीत पटवा जैन ने बताया कि महावीर जयंती भव्य तरीके से मनाई जाएगी,जिसमें शोभा यात्रा के साथ साथ भगवान महावीर की जीवनी पर संगोष्ठी होगी। उन्होनें बताया कि भगवान महावीर जैन धर्म के देवता हैं। राजा के पुत्र होने के नाते, उन्हें अनेक सांसारिक सुख-सुविधाएँ और सेवाएँ प्राप्त थीं। लेकिन तीस वर्ष की आयु में, उन्होंने अपने परिवार और राजपरिवार को त्याग दिया, अपनी सांसारिक संपत्ति का त्याग किया और दुख, शोक और पीड़ाओं के निवारण का मार्ग खोजने के लिए एक भिक्षु बन गए। उन्होनें अपनी इच्छाओं, भावनाओं और आसक्तियों पर विजय पाने के लिए अगले साढ़े बारह वर्ष गहन मौन और ध्यान में व्यतीत किए। वे सभी असहनीय कठिनाइयों के बावजूद शांत और स्थिर रहे, इसीलिए उन्हें महावीर नाम दिया गया, जिसका अर्थ है अत्यंत वीर और साहसी। इस दौरान उनकी आध्यात्मिक शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित हुईं और अंत में उन्होंने पूर्ण बोध, ज्ञान, शक्ति और आनंद की प्राप्ति की। अजीत सिंह पटवा जैन ने कहा कि जब भगवान महावीर का जन्म हुआ था। उस समय ईश्वरवाद के नाम पर पशु बलि और तरह तरह की हिंसा के कार्य बहुतायत से होते थे । उस समय आम जनता प्रकृति के शुद्ध नियमों से अनभिज्ञ थी । जन मानस अपना सारा समय सिर्फ ईश्वर प्राप्त करने की कोशिश में ही लगा रहता था। भगवान महावीर इसी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए घर बार छोडक़र तपस्या की और सम्पूर्ण ज्ञान हासिल किया। ज्ञान हासिल करने के बाद उन्होंने कहा कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा बनने में सर्व सम्पन्न है, हाँ उसके पुरुषार्थ में अंतर है। दूसरे शब्दों में कहूं तो ईश्वर प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण है स्वयं ईश्वर बनना यानि मोक्ष प्राप्त करना। सब योनियों में मानव योनि सबसे उत्तम है और परमात्मा बनने कि क्षमता रखती है । भगवान महावीर ने कहा कि मैँ तुम्हें कुछ नहीं दे सकता – न खुशी और न दुख । मनुष्य के अपने कर्म ही सुख दुख का निर्धारण करते है, इसमे कोई दूसरा भागीदार नहीं बन सकता है। अत: उन्होंने जीवनोपयोगी सिद्धान्त की घोषणा की जिसमें सर्व प्रथम अहिंसा,अनेकांतवाद, अपरिग्रह, ज्यादा एकत्रित ना करना, आहारचर्या, क्षमा वाणी, वैयावर्त्य (सेवा), अस्तेय (अचौर्य), आसक्ति आदि। इन
सिद्धांतों का सारांश यह है कि शरीर से तीन पुण्य कर्म होते है : रक्षा करना, दान देना एवं सेवा करना। शरीर से तीन पाप कर्म होते है: हिंसा करना, चोरी करना एवं व्यभिचार करना। इसीलिए जीवात्माओं के आचरण और व्यवहार के नियम बने वही धर्म है : जैसे सत्य बोलना, चोरी भ्रष्टाचार नहीं करना, ईमानदारी रखना, न्यायपूर्वक व्यवहार करना (आत्मवत व्यवहार करना – यानि जो मुझे पसंद नहीं वह दूसरे को कैसे पसंद होगा), झूठ छलकपट, धोखा, बेईमानी, अन्याय, शोषण इत्यादि पाप कर्म नहीं करना। इस मौके पर अनिल जैन,उमेश अरोड़ा,योगेश मल्होत्रा,प्रमोद सचदेवा,गोल्डन जैन,प्रोमिल जैन,संचित जैन,शिखा अरोड़ा,जगन्नाथ,अमन,अजय जैन व अनिता जैन सहित कई लोग उपस्थित थे।
सिद्धांतों का सारांश यह है कि शरीर से तीन पुण्य कर्म होते है : रक्षा करना, दान देना एवं सेवा करना। शरीर से तीन पाप कर्म होते है: हिंसा करना, चोरी करना एवं व्यभिचार करना। इसीलिए जीवात्माओं के आचरण और व्यवहार के नियम बने वही धर्म है : जैसे सत्य बोलना, चोरी भ्रष्टाचार नहीं करना, ईमानदारी रखना, न्यायपूर्वक व्यवहार करना (आत्मवत व्यवहार करना – यानि जो मुझे पसंद नहीं वह दूसरे को कैसे पसंद होगा), झूठ छलकपट, धोखा, बेईमानी, अन्याय, शोषण इत्यादि पाप कर्म नहीं करना। इस मौके पर अनिल जैन,उमेश अरोड़ा,योगेश मल्होत्रा,प्रमोद सचदेवा,गोल्डन जैन,प्रोमिल जैन,संचित जैन,शिखा अरोड़ा,जगन्नाथ,अमन,अजय जैन व अनिता जैन सहित कई लोग उपस्थित थे।

