समभाव-समदृष्टि के स्कूल की महिमा, महत्ता और महत्व का दिया संदेश
फरीदाबाद, 23 मार्च। सतयुग दर्शन वसुन्धरा, गाँव भूपानी, फरीदाबाद में रामनवमी यज्ञ वार्षिक महोत्सव की पूर्व संध्या पर हर्षोल्लास, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत एक भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया। इस विशाल शोभायात्रा के माध्यम से समभाव-समदृष्टि के स्कूल ‘ध्यान कक्ष’ की महिमा, महत्ता एवं महत्व का संदेश हजारों श्रद्धालुओं तक पहुँचाया गया।
शोभायात्रा का दृश्य अत्यंत आकर्षक और मनमोहक था। सबसे आगे सतवस्तु के कुदरती ग्रंथ की सवारी चल रही थी, जिसमें आने वाले युग अर्थात सतयुग के संविधान का विस्तृत वर्णन समाहित बताया गया। मार्ग के दोनों ओर श्रद्धा और विश्वास से भरे वातावरण के बीच बैंड की मधुर धुनें गूंज रही थीं। इसके पीछे सुसज्जित बाल कलाकार विभिन्न नृत्य-शैलियों के माध्यम से अपने भाव व्यक्त कर रहे थे। शोभायात्रा में श्वेत वस्त्र धारण किए और गुलनारी दुपट्टा ओढ़े हजारों श्रद्धालु अनुशासित कतारों में शामिल हुए। पूरा वसुन्धरा परिसर आनंद, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर दिखाई दिया।
जब यह शोभायात्रा समभाव-समदृष्टि के स्कूल ‘ध्यान कक्ष’ पहुँची, तब ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने इस आध्यात्मिक केंद्र का विस्तार से परिचय कराया। उन्होंने बताया कि ‘ध्यान कक्ष’ केवल किसी शैक्षणिक परिसर का एक भाग नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक चेतना, मानसिक परिष्कार और आंतरिक उत्कर्ष का दिव्य केंद्र है। उन्होंने कहा कि यह साधना-स्थल विद्यार्थियों के अंतर्मन में समत्व, समदर्शिता और सार्वभौमिक दृष्टिकोण का बीजारोपण करता है। यहाँ का वातावरण शांत, सात्विक और आध्यात्मिक स्पंदनों से परिपूर्ण है, जो साधक को आत्मानुभूति की ओर प्रेरित करता है।
उन्होंने ‘महिमा’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि महिमा किसी स्थान, व्यक्ति या संस्था की विशिष्ट श्रेष्ठता, गौरव और दिव्यता का प्रतीक होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ध्यान कक्ष की महिमा इस बात में निहित है कि यह केवल मौन साधना का स्थान नहीं, बल्कि आत्ममंथन, आत्मावलोकन और आत्मपरिष्कार का पावन केंद्र है। यहाँ विद्यार्थी बाहरी आकर्षणों और विकर्षणों से हटकर अपने अंतर्मन की गहराइयों से जुड़ते हैं, जिससे उनमें धैर्य, संतोष, करुणा, संयम, सहिष्णुता और विवेकशीलता जैसे गुणों का विकास होता है।
अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि ध्यान-साधना के माध्यम से मन की चंचलता शांत होती है और जीवन के विविध आयामों में संतुलन स्थापित होता है। इसी दौरान आत्मबोध की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य को अपनी आत्मा की अजर-अमर सत्ता का अनुभव होता है, तब उसका दृष्टिकोण सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठ जाता है।
इसके बाद उन्होंने ‘महत्ता’ का अर्थ समझाते हुए कहा कि किसी विषय, संस्था या क्रिया की सामाजिक, नैतिक, शैक्षणिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से प्रधान भूमिका ही उसकी महत्ता कहलाती है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग की आपाधापी, प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव के बीच ध्यान कक्ष की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। यह स्थान विद्यार्थियों को केवल शैक्षिक उत्कृष्टता की ओर ही नहीं ले जाता, बल्कि नैतिक दृढ़ता, मानवीय संवेदनशीलता और आध्यात्मिक परिपक्वता की दिशा में भी प्रेरित करता है। यहाँ की साधना और शिक्षा से व्यक्ति सत्य, धर्म और परोपकार के मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
श्री सजन जी ने आगे ‘महत्व’ का भी उल्लेख करते हुए कहा कि किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था का जीवन और समाज पर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रभाव ही उसका महत्व होता है। उन्होंने कहा कि ध्यान कक्ष का महत्व केवल व्यक्तिगत उत्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता, वैश्विक बंधुत्व और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को भी सुदृढ़ करता है। समभाव और समदृष्टि के सिद्धांत मनुष्य को राग-द्वेष, भेदभाव और संकीर्णता से ऊपर उठाकर व्यापक और समन्वित दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। इससे करुणा, उदारता, क्षमाशीलता और परस्पर सद्भाव जैसे गुण विकसित होते हैं, जो एक सुसंस्कृत समाज की आधारशिला हैं।
उन्होंने कहा कि समभाव-समदृष्टि का स्कूल ‘ध्यान कक्ष’ चरित्र निर्माण का प्रेरक केंद्र और जीवन मूल्यों का अक्षय स्रोत है। इसकी महिमा अलौकिक, महत्ता अनुपम और महत्व अपरिमेय है। यह केंद्र न केवल सत्य ज्ञान का प्रकाश फैलाता है, बल्कि आत्मोन्नति, आत्मसंयम और आत्मबोध की दिशा में मानव को प्रेरित करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति का व्यक्तित्व सतयुगी नैतिकता, संतुलन, समग्रता और सौम्यता से परिपूर्ण बनता है।
कार्यक्रम के अंत में विश्व स्तर पर सभी मानवों से करबद्ध आह्वान किया गया कि वे समभाव-समदृष्टि के स्कूल की गतिविधियों से जुड़ें, ताकि प्रत्येक मन में नैतिकता का विकास हो, प्रत्येक मानव सज्जनता का प्रतीक बने और अपने कर्तव्यों का निर्वहन निर्विकार भाव से करते हुए जीवन के वास्तविक विश्राम और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर हो सके।

