बेसहारा लोगों को भोजन-कपड़ा और आर्थिक सहायता प्रदान कर, परमार्थी बनो
फरीदाबाद | जैसा कि ज्ञात ही है कि फरीदाबाद, भूपानि ग्राम स्थित, सतयुग दर्शन ट्रस्ट (रजि0), माह जुलाई में, वैश्विक स्तर पर, भोजन-कपड़े और कम से कम, अपनी अपनी एक माह की कुल आमदन, जरूरतमंदों की सहायतार्थ उनके मध्य वितरित करने की मुहिम चला रहा है। इस मुहिम के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए, ट्रस्ट के प्रवक्ता ने बताया कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक इस युग में इंसान की मन: सोच इतनी संकुचित हो गई है कि वह केवल “मैं और मेरा” तक ही सीमित रह गई है। इसलिए वह आज जो कुछ भी अर्जित कर रहा है, चाहे वह सम्पति है, धन-दौलत है, पोशाक है, घर-बार है या कुछ और है केवल अपने या अपनों के लिए ही कर रहा है। विडम्बना की बात यह है कि भौतिक अर्जना की यह होड उसे काम/कामनाओं का गुलाम बना इतना लोभी, क्रोधी, स्वार्थी व अहंकारी बना देती है कि अपने व अपनो के अतिरिक्त, असहाय, दीन व लाचार भाई-बंधुओ/वर्ग की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जा पाता और न ही वह उनके निमित्त उदार ह्मदय से अपनी आय या संसाधनों के कुछ हिस्से का निष्काम भाव से त्याग कर पाता है। यदि ध्यान से देखा जाए तो यही मोह-माया या ममता इंसान के दु:खों का मूल कारण है। इसी में फँसकर इंसान “वसुधैव कुटुम्बकम्” यानि यह समूचा पृथ्वी एक परिवार है अथवा यह पूरा संसार/ब्राहृाण्ड ब्राहृमय है, इस सर्वोत्कृष्ट भावना से विमुख हो, उन के प्रति अपने कत्र्तव्य से विमुख हो जाता है और समानता/समभाव के स्थान पर अमीरी-गरीबी, वड-छोट आदि का द्वैतात्मक व द्वंद्वात्मक भाव पैदा हो जाता है। इस संदर्भ में सभी मानेंगे कि यह कलियुग के नकारात्मक भाव-स्वभावों में गलतान हो स्वार्थपरता का प्रतीक बनने जैसी अधर्मयुक्त बात होती है।
ज्ञात हो मानव मन से इसी अहंता के प्रतीक, स्वार्थपर, द्वैतात्मक व द्वंद्वात्मक विषम भाव को समाप्त कर, उसको उसके विशाल कुटुम्ब के प्रति निज कत्र्तव्य का बोध कराने हेतु, सतयुग दर्शन ट्रस्ट (रजि0) ने देश-विदेश में स्थापित महाबीर सत्संग सभा के सदस्यों व साधारण जनता से अपील की है कि वे अपने व अपने बच्चों में उदारता से युक्त दाता भाव पैदा करने के लिए, अपने हाथों से माह जुलाई में असहाय सजनों की सहायतार्थ निष्काम भाव से खाना, कपड़े व कुछ धनराशि आदि वितरित करें और इस तरह स्वार्थी से परमार्थी बन सर्वहितकारी नाम कहाएं। यही नहीं ट्रस्ट ने यह भी अपील की है कि यह क्रिया गली-गली, कूचे-कूचे में छिपे जरुरतमन्द सजनों का भली-भांति जायज़ा ले, आप करो व अन्यों से जहाँ भी आपका सम्पर्क है, उन्हें संग लें, उनसे भी करवाओ। जायजा लेने से यहाँ आशय, कुटुम्ब में कौन त्राहिमाम कर रहा है, कौन रो रहा है, कौन दु:ख से तड़फ रहा है, कौन निर्वस्त्र है, किसको खाने में पूर्ण तृप्ति नहीं मिल रही यानि भूखा ही सो जाता है, उसका परीक्षण करने से है। इस तरह योग्य सजनों को खोज-खोज कर, आत्मीयता के भाव से, प्रसन्नतापूर्वक उन तक उनका हक पहुँचाओ और उनके उदासीन/गमगीन चेहरों से झलकने वाली संतोष भरी क्षणिक मुस्कराहट का परम सुख प्राप्त कर धन्य हो जाओ।
याद रखो ऐसा करने से यानि दूसरों के हित के निमित्त अपने स्वार्थ का त्याग करने से जो आनन्द प्राप्त होगा वह न तो अर्जित सम्पत्ति या धन-धान्य अथवा अन्य संसाधनों का स्वयं उपभोग करने से प्राप्त हो सकेगा और न ही उसे अपनो के मध्य उन्हें वितरित करने से मिल सकेगा। वह आनन्द तो केवल जरूरतमंदों को भरपेट भोजन खिलाकर, अच्छे वस्त्र पहनाकर, उनके जरूरत की आवश्यक वस्तुएँ देकर या कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करके ही मिल सकेगा। यही नहीं इस क्रिया से भौतिक वस्तुओं के प्रति जो हमारे अन्दर अहंता-ममता है वह भी छूटेगी और संतोष, धैर्य, सच्चाई, निष्कामता, त्याग, परोपकार जैसे मानवीय सहज गुणों को अन्दर पनपने का अवसर भी मिलेगा। अत: इस अपार महत्ता के दृष्टिगत सबसे गुज़ारिश की जाती है कि कुदरत का ईशारा समझो और तद्नुसार क्रिया करके पुण्य कमाओ ताकि वर्तमान जीवन के साथ-साथ आपका आगामी जन्म भी सम्पन्नता एवं खुशहाली से भरपूर हो।
इस संदर्भ में ट्रस्ट के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह कोई अनूठी या नई बात नहीं है, हमारे वेद-शास्त्र भी इस नियम का समर्थन करते हैं और अपनी सामथ्र्य अनुसार, कमाई का दसवाँ हिस्सा, संसार रूपी कुटुम्ब के दुखिया सदस्यों की सेवार्थ समर्पित करने का विधान बताते हैं। अत: इस विधान के तहत् केवल अपने घरों, अलमारियों या तिजोरियों को भरने में मत लगे रहो अपितु वेद-शास्त्रों की वाणी का आदर करते हुए यानि गुरुमत प्रवान करते हुए, घरों व अलमारियाँ में जो भी अच्छी स्थिति में पड़ा हुआ सामान प्रयोग में न आ रहा हो, उसे पूरी ईमानदारी से प्रसन्नतापूर्वक जरूरतमंद योग्य सुपात्र को सौंप दो। कहने का आशय यह है कि आपके लिए जो फालतू है पर अन्य की आवश्यकता है उसे उनके मध्य बाँटकर, परोपकार का ऐसा बीज अपने अन्दर बो दो कि फिर कभी किसी लाचार तक उसका हिस्सा सहर्ष पहुँचाने में आपका दिल कभी न सकुचाएं। फिर से निवेदन है कि अन्यों की सेवार्थ की जाने वाली इस क्रिया मे हार मत खाओ क्योंकि इस क्रिया से आपके मन-चित्त को प्रसन्नता व शान्ति तो प्राप्त होगी ही साथ ही आज की शुभ करनी का फल कल मिलेगा ही मिलेगा।
अंत में ट्रस्ट के प्रवक्ता ने कहा कि यह एक विश्व-व्यापी अभियान है जिसका शुभारम्भ प्रथम जुलाई से होगा और 31 जुलाई तक यह क्रिया चलेगी। अतैव आओ इस विश्वस्तरीय सेवा अभियान का हिस्सा बनें और उदारतापूर्वक जरूरतमंदों की जो अमानत हमारे पास पड़ी है, उसे उन सब तक मिल कर पहुँचाने का कत्र्तव्य हँस कर निभाएं। इस हेतु जागें और अन्यों को जागृति में लाएं यानि जो प्रारब्ध अनुसार प्राप्त हुआ है, उसे परिवार के सब सदस्य सज्जनतापूर्वक मिल बाँट कर खाएं और इस जगत को सुखाला गृह बनाएं।
