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फरीदाबाद | 2 फरवरी 2026

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक पर्यटन स्थल सूरजकुंड में आयोजित 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला–2026 इन दिनों देश-विदेश से आए पर्यटकों के बीच खास आकर्षण बना हुआ है। इस वर्ष मेले में थीम स्टेट के रूप में उत्तर प्रदेश की सहभागिता ने सांस्कृतिक विविधता को एक नई पहचान दी है। उत्तर प्रदेश पवेलियन में राज्य की पारंपरिक कला, शिल्प, वस्त्र और सांस्कृतिक जीवनशैली को जिस सजीवता के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह पर्यटकों को सहज ही अपनी ओर खींच रहा है।

सूरजकुंड शिल्प मेला लंबे समय से भारतीय हस्तशिल्प और लोक संस्कृति का एक बड़ा मंच माना जाता है। हर वर्ष यहां अलग-अलग राज्यों और देशों की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश की थीम ने खास तौर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।


उत्तर प्रदेश पवेलियन में दिखी सांस्कृतिक विरासत की झलक

उत्तर प्रदेश पवेलियन में प्रवेश करते ही पर्यटकों को राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का अनुभव होता है। पारंपरिक सजावट, लोक कलाओं के नमूने, हस्तशिल्प और वस्त्रों की विविधता उत्तर प्रदेश की पहचान को बखूबी दर्शाती है। पवेलियन में घूमते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो पर्यटक बनारस, लखनऊ और अन्य सांस्कृतिक केंद्रों की गलियों से होकर गुजर रहे हों।

राज्य की पारंपरिक जीवनशैली, कारीगरों की मेहनत और सदियों पुरानी कला परंपराओं को यहां एक ही स्थान पर देखने का अवसर मिल रहा है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश पवेलियन मेले के सबसे अधिक देखे जाने वाले हिस्सों में शामिल हो गया है।


बनारसी साड़ियों का जलवा

उत्तर प्रदेश पवेलियन में सबसे ज्यादा आकर्षण बनारसी साड़ियों को लेकर देखने को मिल रहा है। अपनी बारीक बुनाई, रेशमी बनावट और पारंपरिक डिज़ाइनों के लिए प्रसिद्ध बनारसी साड़ियां मेले में आने वाली महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई हैं।

मेले में मौजूद कई पर्यटक बताते हैं कि बनारसी साड़ियों की खासियत यह है कि वे पारंपरिक होने के साथ-साथ आधुनिक फैशन के साथ भी मेल खाती हैं। यही कारण है कि युवा वर्ग से लेकर वरिष्ठ महिलाएं तक इन साड़ियों में गहरी रुचि दिखा रही हैं।


स्टॉल नंबर 110 पर उमड़ी भीड़

उत्तर प्रदेश पवेलियन में स्थित स्टॉल नंबर 110 इन दिनों खास चर्चा में है। यहां बनारस के शिल्पकार मोहम्मद आसिफ द्वारा लगाए गए बनारसी साड़ियों के स्टॉल पर सुबह से ही महिलाओं की भीड़ देखने को मिल रही है। पर्यटक अलग-अलग रंगों, डिज़ाइनों और कारीगरी वाली साड़ियों को देख-परख कर खरीदारी कर रहे हैं।

इस स्टॉल पर उपलब्ध साड़ियों में पारंपरिक ज़री का काम, फूलों और ज्यामितीय आकृतियों की बुनाई तथा हल्के-भारी दोनों तरह के डिज़ाइन शामिल हैं। खरीदारों का कहना है कि यहां उन्हें एक ही जगह पर विविध विकल्प मिल रहे हैं, जिससे चयन करना आसान हो जाता है।


विदेशी पर्यटकों की भी बढ़ी रुचि

सूरजकुंड शिल्प मेला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखता है, और इसका असर उत्तर प्रदेश पवेलियन में भी साफ दिखाई दे रहा है। बनारसी साड़ियों को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी स्टॉल नंबर 110 पर रुकते नजर आ रहे हैं।

कई विदेशी मेहमान बनारसी साड़ियों की बारीक कारीगरी और रेशमी बनावट को देखकर प्रभावित हो रहे हैं। कुछ पर्यटक इसे भारतीय संस्कृति का एक अहम प्रतीक मानते हुए इसे स्मृति-चिह्न के रूप में खरीद रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि पारंपरिक भारतीय वस्त्र आज भी वैश्विक स्तर पर लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।


शिल्पकारों के लिए बड़ा मंच

सूरजकुंड शिल्प मेला शिल्पकारों के लिए केवल बिक्री का अवसर नहीं, बल्कि अपनी कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का मंच भी है। बनारस के शिल्पकार मोहम्मद आसिफ का कहना है कि इस तरह के आयोजनों से कारीगरों को सीधे ग्राहकों से जुड़ने का मौका मिलता है।

उन्होंने बताया कि यहां आने वाले पर्यटक न केवल खरीदारी करते हैं, बल्कि साड़ियों की बुनाई, डिज़ाइन और परंपरा के बारे में भी जानने में रुचि दिखाते हैं। इससे कारीगरों को अपनी कला के महत्व को समझाने और उसे संरक्षित रखने का अवसर मिलता है।


पारंपरिक शिल्प और आधुनिक पसंद का मेल

बनारसी साड़ियों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि इनमें पारंपरिक शिल्प और आधुनिक फैशन का संतुलन देखने को मिलता है। सूरजकुंड मेले में प्रदर्शित साड़ियों में जहां पारंपरिक डिज़ाइन मौजूद हैं, वहीं हल्के रंगों और नए पैटर्न के विकल्प भी उपलब्ध हैं।

कई खरीदारों का कहना है कि वे इन साड़ियों को पारिवारिक समारोहों के साथ-साथ आधुनिक आयोजनों में भी पहनना पसंद करते हैं। यह बदलती पसंद बनारसी शिल्प को समय के साथ प्रासंगिक बनाए रखने में मदद कर रही है।


महिलाओं के लिए विशेष आकर्षण

मेले में आने वाली महिलाओं के लिए उत्तर प्रदेश पवेलियन एक प्रमुख आकर्षण बन चुका है। खासकर बनारसी साड़ियों के स्टॉल पर महिलाएं अलग-अलग डिज़ाइनों की तुलना करती और अपने पसंदीदा विकल्प चुनती नजर आती हैं।

कुछ महिलाएं इसे पारंपरिक पहनावे के रूप में देख रही हैं, तो कुछ इसे उपहार के तौर पर खरीद रही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि बनारसी साड़ियां केवल पहनने की वस्तु नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी हैं।


उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश पवेलियन केवल साड़ियों तक सीमित नहीं है। यहां राज्य की लोक कला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक प्रतीकों को भी प्रदर्शित किया गया है। इन सभी तत्वों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि उत्तर प्रदेश की संस्कृति कितनी विविध और समृद्ध है।

पर्यटक बताते हैं कि पवेलियन में घूमते हुए उन्हें राज्य की परंपराओं को करीब से समझने का मौका मिल रहा है। यह अनुभव मेले को केवल खरीदारी का स्थान न बनाकर एक सांस्कृतिक यात्रा में बदल देता है।


सूरजकुंड मेला और सांस्कृतिक संवाद

सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला वर्षों से विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम रहा है। इस वर्ष उत्तर प्रदेश की थीम स्टेट के रूप में मौजूदगी ने इस संवाद को और मजबूत किया है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग यहां एक-दूसरे की संस्कृति, परंपरा और कला को समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान ही सूरजकुंड मेले की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।


पर्यटकों की प्रतिक्रिया

मेले में आए कई पर्यटकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश पवेलियन ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया है। खासकर बनारसी साड़ियों की गुणवत्ता और विविधता को लेकर लोगों में उत्साह देखने को मिल रहा है।

कुछ पर्यटक यह भी कहते नजर आए कि इस तरह के आयोजनों से पारंपरिक शिल्प को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलती है। इससे न केवल कारीगरों को लाभ होता है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहती है।


शिल्प और संस्कृति का संगम

39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले में उत्तर प्रदेश की थीम स्टेट के रूप में मौजूदगी यह दिखाती है कि भारतीय शिल्प और संस्कृति आज भी लोगों के जीवन में अहम स्थान रखते हैं।

बनारसी साड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि पारंपरिक कारीगरी समय के साथ अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। सूरजकुंड मेला ऐसे ही शिल्पकारों और उनकी कला को मंच देने का कार्य कर रहा है।

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