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फरीदाबाद 23-02-25

फरीदाबाद में डिजिटल माध्यम से की गई एक बड़ी वित्तीय ठगी के मामले में साइबर थाना बल्लभगढ़ की टीम ने तीन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई जनवरी 2026 में दर्ज एक शिकायत के आधार पर की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि डिजिटल अरेस्ट की आशंका दिखाकर 2,13,16,000 रुपये की राशि विभिन्न बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई गई। पुलिस ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर महाराष्ट्र के थाठे क्षेत्र से तीन आरोपितों को हिरासत में लिया है।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों की पहचान पंकज सुहास कांटे निवासी पंचशील नगर, सुभाष टेकड़ी, उल्हासनगर, महाराष्ट्र; सौरभ देव कुल्ले निवासी प्रकाश नगर, अंबरनाथ ईस्ट, महाराष्ट्र; तथा अजय दामोदर भगत निवासी यवतमाल, महाराष्ट्र के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार इनकी गिरफ्तारी तकनीकी विश्लेषण और डिजिटल ट्रैकिंग के बाद की गई। आरोपितों को ट्रांजिट रिमांड पर फरीदाबाद लाया जा रहा है, जहां उन्हें अदालत में पेश कर आगे की पूछताछ की जाएगी।

पुलिस प्रवक्ता द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सेक्टर-64C फरीदाबाद निवासी एक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने बताया कि 13 जनवरी को उसकी पत्नी के पास एक कॉल आई थी। कॉल करने वाले व्यक्ति ने स्वयं को टेलीकॉम विभाग का अधिकारी बताया और कहा कि उनके आधार कार्ड से जुड़े एक बैंक खाते में मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित 20 लाख रुपये का लेनदेन पाया गया है। इसके बाद कॉल को कथित रूप से मुंबई क्राइम ब्रांच से जोड़ने की बात कही गई।

शिकायत के अनुसार, संबंधित व्यक्ति को लगातार वीडियो कॉल पर रखा गया। उन्हें घर से बाहर न जाने और नियमित रूप से वीडियो कॉल पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए। हर दो घंटे में कॉल कर गतिविधियों की निगरानी की जाती रही। इस दौरान कथित रूप से 15 जनवरी को Directorate of Enforcement के नाम से “Freezing Funds Control Order” और “Arrest Order” भेजे गए। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट के नाम से एक पत्र भेजा गया, जिसमें सत्यापन के नाम पर बैंक खातों की समस्त राशि निर्दिष्ट खातों में ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए। पत्र में 48 से 72 घंटे के भीतर राशि वापस करने का आश्वासन भी दिया गया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार गिरफ्तारी के भय के कारण विभिन्न ट्रांजेक्शन के माध्यम से कुल 2,13,16,000 रुपये आरोपितों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दिए गए। बाद में 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के नाम से फर्जी एनओसी और पीसीसी पत्र भेजे गए, जिनमें उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग मामले से मुक्त किए जाने का दावा किया गया। जब शिकायतकर्ता ने धनराशि वापस लेने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया तो आरोपितों से संपर्क स्थापित नहीं हो सका। इसके बाद पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

शिकायत प्राप्त होने के बाद साइबर थाना बल्लभगढ़ में संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच के दौरान बैंक खातों, कॉल रिकॉर्ड, आईपी एड्रेस और डिजिटल डिवाइस से संबंधित साक्ष्यों का विश्लेषण किया गया। तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर तीनों आरोपितों की पहचान की गई और उन्हें महाराष्ट्र से हिरासत में लिया गया।

प्रारंभिक पूछताछ में यह सामने आया कि तीनों आरोपित कथित रूप से मुख्य संचालकों के लिए तकनीकी सहयोग का कार्य कर रहे थे। पुलिस के अनुसार आरोपितों को एक विशेष डिवाइस उपलब्ध कराई गई थी, जिसमें एक साथ 250 से अधिक सिम कार्ड संचालित किए जा सकते थे। इन सिम कार्ड को सक्रिय कर डिवाइस में लगाया जाता था और कॉलिंग तथा अन्य डिजिटल गतिविधियों के लिए उपयोग किया जाता था। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इस डिवाइस का उपयोग कितने मामलों में किया गया और क्या अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की घटनाएं हुई हैं।

डिजिटल अरेस्ट जैसी अवधारणा का उपयोग कर लोगों को भयभीत करने की घटनाएं हाल के समय में विभिन्न स्थानों पर सामने आई हैं। इस प्रकार की ठगी में प्रायः कॉल करने वाले स्वयं को किसी सरकारी विभाग, जांच एजेंसी या न्यायिक संस्था से जुड़ा बताकर विश्वास पैदा करने का प्रयास करते हैं। इसके बाद कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पीड़ित से धनराशि ट्रांसफर करवाई जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आधिकारिक एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से इस प्रकार धनराशि स्थानांतरित करने के निर्देश नहीं दिए जाते।

साइबर अपराधों में तकनीकी संसाधनों का उपयोग बढ़ने के कारण जांच एजेंसियों के लिए भी चुनौतियां बढ़ी हैं। मल्टी-सिम डिवाइस, इंटरनेट कॉलिंग और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से पहचान छिपाने का प्रयास किया जाता है। हालांकि डिजिटल लेनदेन के रिकॉर्ड और तकनीकी विश्लेषण से संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाया जा सकता है। इस मामले में भी तकनीकी जांच के आधार पर आरोपितों तक पहुंचने का दावा किया गया है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार आरोपितों से पूछताछ के दौरान यह भी जांच की जाएगी कि उन्हें किसने निर्देश दिए, वित्तीय लेनदेन किस प्रकार विभाजित किए गए और क्या कोई संगठित नेटवर्क इस गतिविधि के पीछे सक्रिय है। डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच से अतिरिक्त जानकारी मिलने की संभावना है। बैंकिंग चैनलों के माध्यम से किए गए लेनदेन का भी विश्लेषण किया जा रहा है ताकि संभावित धनराशि की ट्रेसिंग की जा सके।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का सुझाव है कि नागरिक किसी भी अनजान कॉल पर व्यक्तिगत या वित्तीय जानकारी साझा न करें। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर गिरफ्तारी या जांच का हवाला देता है, तो संबंधित विभाग के आधिकारिक संपर्क माध्यम से पुष्टि करना आवश्यक है। किसी भी प्रकार के कानूनी दस्तावेज की सत्यता की जांच आधिकारिक वेबसाइट या संबंधित कार्यालय से की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, किसी भी दबाव या भय के माहौल में वित्तीय लेनदेन से बचना चाहिए।

फरीदाबाद पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे संदिग्ध कॉल, संदेश या ईमेल के संबंध में सतर्क रहें। साइबर अपराध की स्थिति में तुरंत शिकायत दर्ज कराना महत्वपूर्ण है, ताकि समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सके। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और स्थानीय साइबर थाने इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध हैं। समय पर सूचना मिलने से धनराशि की रिकवरी की संभावना बढ़ सकती है।

वर्तमान मामले में आरोपितों को ट्रांजिट रिमांड पर फरीदाबाद लाया जा रहा है। अदालत में पेशी के बाद आगे की रिमांड और पूछताछ की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। जांच पूरी होने के बाद संबंधित साक्ष्यों के आधार पर आरोप-पत्र दाखिल किया जाएगा। अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर लिया जाएगा।

यह मामला डिजिटल माध्यम से की जाने वाली ठगी की गंभीरता को दर्शाता है। तकनीकी साधनों का दुरुपयोग कर व्यक्तियों को मानसिक दबाव में लाकर वित्तीय नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसलिए डिजिटल जागरूकता और सतर्कता आवश्यक है। कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस प्रकार की गतिविधियों के विरुद्ध कार्रवाई जारी रखने की बात कह रही हैं। जांच के आगे बढ़ने के साथ मामले से जुड़े अन्य तथ्यों के सामने आने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है।

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