फरीदाबाद, 18 फरवरी 2026
स्ट्रोक जैसी गंभीर और जीवन के लिए खतरनाक बीमारी के आधुनिक उपचार को लेकर शहर में चिकित्सा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की गई। सेक्टर स्थित एकॉर्ड अस्पताल में बुधवार को “एकॉर्ड स्ट्रोक इंटरवेंशन वर्कशॉप” का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य न्यूरोलॉजी से जुड़े डॉक्टरों को स्ट्रोक के अत्याधुनिक इलाज की तकनीकों से अवगत कराना और उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था। यह हैंड्स-ऑन कार्यशाला अस्पताल की अत्याधुनिक न्यूरो कैथ लैब में आयोजित की गई, जिसमें शहर और आसपास के क्षेत्रों के न्यूरो विशेषज्ञों, चिकित्सकों और मेडिकल स्टाफ ने सक्रिय भागीदारी की।
कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत संबोधन के साथ हुई, जिसमें अस्पताल प्रबंधन ने स्ट्रोक के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए आधुनिक तकनीक आधारित उपचार की आवश्यकता पर जोर दिया। अस्पताल के चेयरमैन डॉ. जितेंद्र कुमार ने कहा कि बदलती जीवनशैली, बढ़ता मानसिक तनाव, असंतुलित खानपान और बढ़ती उम्र के कारण नसों से संबंधित बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। स्ट्रोक इन्हीं में से एक गंभीर समस्या है, जो मस्तिष्क में रक्तस्राव या रक्त प्रवाह रुकने के कारण होती है।
उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के मामलों में हर मिनट कीमती होता है। यदि समय पर सही उपचार न मिले तो मरीज को स्थायी लकवा, बोलने में कठिनाई या अन्य न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। डॉ. जितेंद्र कुमार ने यह भी बताया कि एकॉर्ड अस्पताल को स्ट्रोक के विश्वस्तरीय उपचार के लिए नौ बार प्लेटिनम अवार्ड प्राप्त हो चुका है, जो यहां उपलब्ध उन्नत चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ टीम की दक्षता को दर्शाता है।
कार्यशाला की अध्यक्षता न्यूरोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. रोहित गुप्ता ने की। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य तीव्र स्ट्रोक (एक्यूट स्ट्रोक) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक तकनीक “मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी” के बारे में डॉक्टरों को व्यावहारिक जानकारी देना था। उन्होंने बताया कि यह तकनीक उन मामलों में अत्यंत प्रभावी साबित होती है, जहां मस्तिष्क की किसी प्रमुख रक्तवाहिनी में थक्का जम जाने से रक्त प्रवाह रुक जाता है।
डॉ. रोहित गुप्ता ने विस्तार से बताया कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी में विशेष कैथेटर और उपकरणों की सहायता से रक्त वाहिका में जमे थक्के को बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया न्यूरो कैथ लैब में की जाती है और इसके लिए उच्च प्रशिक्षित टीम की आवश्यकता होती है। यदि मरीज को निर्धारित समय सीमा के भीतर यह उपचार मिल जाए तो उसकी जान बचाने के साथ-साथ स्थायी विकलांगता की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को अस्पताल की अत्याधुनिक न्यूरो कैथ लैब का भ्रमण कराया गया। विशेषज्ञों ने लाइव डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी की पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से समझाई। उपकरणों के चयन, कैथेटर की स्थिति, थक्के को हटाने की तकनीक और संभावित जटिलताओं से निपटने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम समन्वयक और वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. संदीप घोष ने फ्लो मॉडल्स के माध्यम से डॉक्टरों को तकनीक का प्रायोगिक अनुभव कराया। उन्होंने बताया कि जटिल परिस्थितियों में भी सटीक निर्णय और सही तकनीकी कौशल उपचार की सफलता सुनिश्चित करते हैं। फ्लो मॉडल्स पर अभ्यास से प्रतिभागियों को वास्तविक परिस्थितियों की समझ विकसित करने में मदद मिली।
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. मेघा शारदा ने कहा कि स्ट्रोक तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या है और भारत में इसके मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप ही मरीज के जीवन और भविष्य को सुरक्षित रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं चिकित्सा समुदाय को नई तकनीकों से अपडेट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कार्यक्रम के दौरान एक इंटरएक्टिव प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें उपस्थित चिकित्सकों ने विशेषज्ञों से विभिन्न तकनीकी सवाल पूछे। मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी की समय सीमा, मरीज चयन के मानदंड, जोखिम कारक, संभावित जटिलताएं और पोस्ट-प्रोसीजर देखभाल जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने वास्तविक केस स्टडी और उदाहरणों के माध्यम से चिकित्सकों की शंकाओं का समाधान किया।
विशेषज्ञों ने बताया कि स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चेहरे का एक तरफ झुक जाना, हाथ-पैर में अचानक कमजोरी, बोलने में दिक्कत और तेज सिरदर्द जैसे लक्षण दिखते ही मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “गोल्डन आवर” की अवधारणा स्ट्रोक में अत्यंत महत्वपूर्ण है और उपचार में देरी गंभीर परिणाम दे सकती है।
अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि भविष्य में भी इस प्रकार की शैक्षणिक और प्रशिक्षण आधारित गतिविधियां आयोजित की जाती रहेंगी, ताकि चिकित्सकों को नवीनतम तकनीकों की जानकारी मिलती रहे और मरीजों को बेहतर एवं सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराया जा सके।
यह कार्यशाला न केवल चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए ज्ञानवर्धक रही, बल्कि शहर में उन्नत स्ट्रोक उपचार सुविधाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक साबित हुई। आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ टीम और समय पर उपचार—इन तीनों के समन्वय से स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन दिया जा सकता है।

