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फरीदाबाद | 2 फरवरी 2026

हरियाणा के प्रसिद्ध सांस्कृतिक एवं पर्यटन स्थल सूरजकुंड में आयोजित 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला–2026 में इस बार हरियाणवी पगड़ी पर्यटकों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मेले की विरासत सांस्कृतिक प्रदर्शनी में पगड़ी न केवल एक परंपरागत परिधान के रूप में, बल्कि हरियाणा की पहचान और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में उभरकर सामने आ रही है।

सूरजकुंड मेले में आने वाले देशी और विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में ‘हरियाणा अपणा घर’ परिसर में पहुंच रहे हैं, जहां विरासत की ओर से संचालित “पगड़ी बंधाओ – फोटो खिंचवाओ” गतिविधि को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। हर आयु वर्ग के लोग पारंपरिक हरियाणवी पगड़ी पहनकर तस्वीरें और सेल्फी ले रहे हैं, जिससे यह अनुभव उनके लिए यादगार बन रहा है।


हरियाणवी पगड़ी: परंपरा और पहचान का प्रतीक

हरियाणवी पगड़ी केवल एक पारंपरिक वस्त्र नहीं है, बल्कि यह सदियों से सम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक पहचान का प्रतीक रही है। ग्रामीण जीवन से लेकर सामाजिक आयोजनों तक, पगड़ी का विशेष महत्व रहा है। यह परंपरा आज भी हरियाणा की सांस्कृतिक चेतना में गहराई से जुड़ी हुई है।

सूरजकुंड मेले में पगड़ी की लोकप्रियता यह दर्शाती है कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव महसूस करना चाहते हैं। पर्यटक जब पगड़ी पहनते हैं, तो वे केवल एक परिधान नहीं अपनाते, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक विरासत का अनुभव करते हैं।


‘हरियाणा अपणा घर’ में उमड़ रही भीड़

मेले में स्थापित ‘हरियाणा अपणा घर’ परिसर में हरियाणवी जीवनशैली को पारंपरिक स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी परिसर में चल रहा पगड़ी बंधाओ – फोटो खिंचवाओ अभियान पर्यटकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

यहां आने वाले लोग न केवल पगड़ी पहनकर फोटो खिंचवा रहे हैं, बल्कि इसके पीछे की सांस्कृतिक कहानी और महत्व को भी समझने में रुचि दिखा रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी वर्गों के लोग इस गतिविधि में भाग लेते नजर आ रहे हैं।


सेल्फी संस्कृति और परंपरा का संगम

आज के डिजिटल दौर में सेल्फी और फोटोग्राफी हर पर्यटन स्थल का अहम हिस्सा बन चुकी है। सूरजकुंड मेले में हरियाणवी पगड़ी ने इस आधुनिक ट्रेंड को पारंपरिक संस्कृति से जोड़ दिया है।

पर्यटक पारंपरिक पगड़ी पहनकर न केवल अपनी तस्वीरें साझा कर रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से हरियाणवी संस्कृति को व्यापक पहचान भी मिल रही है। इससे यह परंपरा नए रूप में युवा पीढ़ी तक पहुंच रही है।


विदेशी पर्यटकों में भी दिखा आकर्षण

सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला होने के कारण यहां बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। हरियाणवी पगड़ी को लेकर विदेशी मेहमानों में भी खास उत्सुकता देखने को मिल रही है।

कई विदेशी पर्यटक पारंपरिक पगड़ी पहनकर इसे भारतीय संस्कृति का एक अनूठा अनुभव बता रहे हैं। उनके लिए यह केवल एक फोटो अवसर नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय विविधता को समझने का माध्यम भी बन रहा है।


संस्कृति से जुड़ने का अवसर

हरियाणवी पगड़ी की लोकप्रियता यह दर्शाती है कि सूरजकुंड मेला केवल खरीदारी या मनोरंजन का स्थल नहीं है, बल्कि यह संस्कृति से जुड़ने का एक सशक्त मंच भी है। यहां आने वाले लोग हरियाणा की परंपराओं, पहनावे और जीवनशैली को करीब से देखने और समझने का अवसर पा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां पारंपरिक संस्कृति को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वे लोगों को सक्रिय भागीदारी के माध्यम से परंपरा से जोड़ती हैं।


विरासत संरक्षण की दिशा में पहल

विरासत द्वारा संचालित यह अभियान हरियाणवी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पगड़ी जैसी पारंपरिक पहचान को मेले जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने से न केवल स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा मिलता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है।


आधुनिक दौर में परंपराओं की प्रासंगिकता

आज के समय में जब जीवनशैली तेजी से बदल रही है, तब हरियाणवी पगड़ी की लोकप्रियता यह साबित करती है कि परंपराएं आज भी लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। सूरजकुंड मेले में पगड़ी का जादू इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक पहचान समय के साथ कमजोर नहीं होती, बल्कि नए रूप में और मजबूत होकर सामने आती है।


पर्यटकों की प्रतिक्रिया

मेले में आए कई पर्यटकों ने बताया कि पगड़ी पहनकर उन्हें हरियाणा की संस्कृति को महसूस करने का अवसर मिला। कुछ पर्यटकों ने इसे अपने लिए एक सम्मानजनक अनुभव बताया, जबकि कई लोगों ने इसे अपनी यात्रा की सबसे खास यादों में से एक कहा।


सूरजकुंड मेला और सांस्कृतिक संवाद

39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला भारतीय सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने का एक प्रमुख मंच बन चुका है। हरियाणवी पगड़ी जैसी पारंपरिक पहचान इस मेले को और भी विशेष बनाती है, जहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

यह मेला न केवल शिल्पकारों और कलाकारों को मंच देता है, बल्कि सांस्कृतिक संवाद और आपसी समझ को भी बढ़ावा देता है।

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