इस दिवाली माटी का ही नहीं,
भीतर का भी दीया जलाएं।
घर की सफाई तो हर साल होती है,
पर इस बार मैंने मन की भी सफाई की है।
अब मन चमक गया है —
ना किसी से बैर, ना किसी से विरोध।
ना किसी से अधिक लगाव,
ना किसी से अपेक्षा।
ना ज़रूरत से ज़्यादा बातचीत,
ना मेल-जोल का दिखावा।
ना किसी की बुराई,
ना किसी की तारीफ का मोह।
बस मन में शांति है —
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।
इस दीपावली सबके जीवन में सुख उतरे,
तन में उजाला रहे,
और मन में भी सदा दीप जले। 



– डॉ. सत्यवान सौरभ

