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फरीदाबाद | 3 फरवरी 2026

39वें सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला–2026 में मंगलवार का दिन पूरी तरह लोक कला, लोक संस्कृति और वैश्विक सांस्कृतिक संवाद के नाम रहा। मेले की मुख्य चौपाल (बड़ी चौपाल) पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने दर्शकों को भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय लोक परंपराओं से भी रू-बरू कराया। यह दिन साबित करता है कि सूरजकुंड मेला केवल शिल्प और व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व संस्कृतियों के संगम का जीवंत मंच है।

दिनभर चली प्रस्तुतियों में भारतीय राज्यों के लोक कलाकारों के साथ-साथ कई देशों से आए विदेशी कलाकारों ने भी अपने पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। चौपाल पर उमड़ी भारी भीड़, तालियों की गूंज और दर्शकों का उत्साह इस बात का प्रमाण था कि लोक संस्कृति आज भी लोगों के दिलों में गहराई से बसती है।


मुख्य चौपाल बनी सांस्कृतिक ऊर्जा का केंद्र

मंगलवार को सूरजकुंड शिल्प मेले की मुख्य चौपाल एक ऐसे मंच के रूप में उभरी, जहां भारत और दुनिया की लोक संस्कृतियां एक साथ सांस लेती नजर आईं। पारंपरिक वेशभूषा, जीवंत संगीत और तालबद्ध नृत्य ने पूरे वातावरण को रंगीन और ऊर्जावान बना दिया।

कार्यक्रमों के दौरान दर्शकों ने न केवल कलाकारों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया, बल्कि उन्हें कैमरों और मोबाइल फोन में कैद करते हुए यादगार पलों को सहेजते भी दिखे। कई पर्यटक कलाकारों के साथ सेल्फी लेते नजर आए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह आयोजन केवल देखने का नहीं, बल्कि अनुभव करने का उत्सव है।


भारतीय लोक नृत्यों ने दिखाई सांस्कृतिक विविधता

भारत के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों ने अपनी पारंपरिक नृत्य शैलियों के माध्यम से क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को मंच पर जीवंत कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के कलाकारों ने लोकगीतों और नृत्यों के जरिए ग्रामीण जीवन, लोक परंपराओं और सामाजिक भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

इन प्रस्तुतियों में:

  • पारंपरिक ताल और लोक संगीत

  • रंग-बिरंगे परिधान

  • कथात्मक नृत्य शैलियां

ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता का एहसास कराया। युवा दर्शकों के लिए यह अनुभव विशेष रहा, क्योंकि ऐसे मंच उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं।


विदेशी कलाकारों ने बढ़ाया अंतरराष्ट्रीय आकर्षण

मुख्य चौपाल पर भारत के साथ-साथ कज़ाकिस्तान, टोगो, सूडान, जिंबाब्वे, जाम्बिया, इथोपिया, मिस्र, नाइजीरिया, इराक और वियतनाम जैसे देशों से आए कलाकारों ने भी अपनी लोक नृत्य प्रस्तुतियां दीं। इन प्रस्तुतियों ने यह दिखाया कि भौगोलिक दूरी चाहे कितनी भी हो, लोक कला की भाषा विश्वव्यापी होती है

विदेशी कलाकारों के नृत्य:

  • उनकी पारंपरिक जीवनशैली

  • सामाजिक रीति-रिवाज

  • ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान

को दर्शाते हुए भारतीय दर्शकों के लिए एक नया और समृद्ध अनुभव लेकर आए। तालियों की गूंज और दर्शकों की उत्सुकता यह दर्शा रही थी कि वैश्विक लोक संस्कृति के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है।


दर्शकों की सक्रिय भागीदारी

कार्यक्रम के दौरान दर्शक केवल मूक दर्शक नहीं रहे, बल्कि उन्होंने प्रस्तुतियों में सक्रिय रूप से भाग लिया। कई नृत्यों के दौरान दर्शक भी तालियों और ताल के साथ झूमते नजर आए। यह सहभागिता सूरजकुंड मेले की खास पहचान बन चुकी है, जहां दर्शक और कलाकार के बीच दूरी कम हो जाती है

पर्यटकों का कहना था कि:

  • यहां की प्रस्तुतियां उन्हें रोजमर्रा की भागदौड़ से अलग एक सुकूनभरा अनुभव देती हैं

  • अलग-अलग संस्कृतियों को एक मंच पर देखना दुर्लभ अवसर है

  • बच्चों और युवाओं के लिए यह सीखने और समझने का सशक्त माध्यम है


आत्मनिर्भर भारत की भावना से जुड़ा सांस्कृतिक मंच

इस वर्ष सूरजकुंड शिल्प मेले का स्वरूप आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना पर आधारित है। जहां एक ओर शिल्पकार अपनी हस्तकला के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक कार्यक्रम लोक कलाओं को जीवंत बनाए रखने का कार्य कर रहे हैं।

लोक नृत्य और संगीत:

  • परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाते हैं

  • स्थानीय कलाकारों को पहचान दिलाते हैं

  • सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करते हैं

इस दृष्टि से देखा जाए तो मुख्य चौपाल पर आयोजित कार्यक्रम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति संरक्षण का सशक्त माध्यम हैं।


सूरजकुंड मेला: व्यापार से आगे एक सांस्कृतिक उत्सव

सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला वर्षों से शिल्प और हस्तकला के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप और व्यापक होता गया है। अब यह मेला:

  • शिल्पकारों की आजीविका का मंच

  • कलाकारों की पहचान का अवसर

  • और विश्व संस्कृतियों के मिलन का केंद्र

बन चुका है। मुख्य चौपाल पर आयोजित लोक नृत्य कार्यक्रम इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे व्यापार, कला और संस्कृति एक साथ मिलकर एक समग्र अनुभव रचते हैं।


युवा पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने का प्रयास

आज के डिजिटल युग में जहां युवा पीढ़ी वैश्विक संस्कृति की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है, वहीं सूरजकुंड जैसे आयोजन उन्हें यह एहसास कराते हैं कि अपनी लोक संस्कृति भी उतनी ही समृद्ध और प्रेरणादायक है

मुख्य चौपाल पर प्रस्तुत लोक नृत्यों के माध्यम से:

  • युवाओं को पारंपरिक कला से परिचित कराया जा रहा है

  • सांस्कृतिक गर्व की भावना को बढ़ावा मिल रहा है

  • विविधता में एकता का संदेश सशक्त रूप से सामने आ रहा है


अंतरराष्ट्रीय मैत्री का मंच

विदेशी कलाकारों की सहभागिता ने सूरजकुंड मेले को अंतरराष्ट्रीय मैत्री का मंच बना दिया है। अलग-अलग देशों की संस्कृतियों का शांतिपूर्ण और उत्सवपूर्ण सह-अस्तित्व यह दर्शाता है कि कला और संस्कृति सीमाओं से परे होती हैं।

इस तरह के आयोजन:

  • सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करते हैं

  • देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाते हैं

  • वैश्विक सहयोग को नई दिशा देते हैं


दर्शकों के लिए यादगार दिन

मंगलवार को मुख्य चौपाल पर बिताया गया समय दर्शकों के लिए एक यादगार अनुभव बन गया। कई पर्यटकों ने कहा कि वे पहली बार इतने सारे देशों और राज्यों की लोक कलाओं को एक साथ देख पा रहे हैं।

पर्यटकों का मानना है कि सूरजकुंड मेला:

  • परिवार के साथ समय बिताने का बेहतरीन स्थान है

  • बच्चों के लिए शैक्षणिक और सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करता है

  • और देश-विदेश की विविधता को समझने का अवसर देता है


सांस्कृतिक कार्यक्रमों की निरंतरता

यह उल्लेखनीय है कि सूरजकुंड शिल्प मेला 15 फरवरी 2026 तक जारी रहेगा, जिसमें प्रतिदिन मुख्य चौपाल, छोटी चौपाल और महा चौपाल पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में भी देश-विदेश के कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से मेले को और अधिक रंगीन बनाएंगे।


लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव

39वें सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले की मुख्य चौपाल पर आयोजित यह सांस्कृतिक संध्या यह साबित करती है कि लोक कला और लोक संस्कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत है। यह आयोजन न केवल अतीत की परंपराओं को सहेजता है, बल्कि उन्हें वर्तमान और भविष्य से भी जोड़ता है।

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