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फरीदाबाद | 05 फरवरी 2026

अंतरराष्ट्रीय पवेलियन में मिस्र की शीशल कला ने पर्यटकों को किया आकर्षित

अरावली की पहाड़ियों के बीच आयोजित 39वें अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले में इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय पवेलियन विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां विभिन्न देशों की पारंपरिक कलाएं और हस्तशिल्प एक साथ देखने को मिल रहे हैं। इसी क्रम में पार्टनर नेशन के रूप में शामिल मिस्र की शीशल कला पर्यटकों का ध्यान खींच रही है।

मेले में मिस्र के शिल्पकारों द्वारा प्रस्तुत की गई हस्तनिर्मित वस्तुएं विदेशी संस्कृति की झलक पेश कर रही हैं। ये उत्पाद न केवल अपनी अनूठी बनावट के कारण चर्चा में हैं, बल्कि भारतीय पर्यटकों के बीच भी खास पसंद बनाए हुए हैं।

शीशल कला से बने उत्पादों की खास पहचान

मिस्र के स्टॉल पर शीशल से तैयार किए गए उत्पाद सबसे अधिक चर्चा में हैं। शीशल एक पारंपरिक सामग्री मानी जाती है, जिसका उपयोग मिस्र में लंबे समय से सजावटी और उपयोगी वस्तुओं के निर्माण में किया जाता रहा है। इस कला में बारीक कारीगरी और संतुलित डिज़ाइन का विशेष ध्यान रखा जाता है।

स्टॉल पर प्रदर्शित शीशल से बने ज्वेलरी बॉक्स पर्यटकों की पहली पसंद बने हुए हैं। इन बॉक्सों की बनावट आकर्षक होने के साथ-साथ मजबूत भी है। लोग इन्हें सजावट और उपयोग दोनों के लिए खरीद रहे हैं।

उपयोगी और सजावटी वस्तुओं की भरमार

शीशल कला से बने बर्नर भी पर्यटकों का ध्यान खींच रहे हैं। इन बर्नरों का उपयोग घर में खुशबू फैलाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा फूड टोकरी, हाथ और गले के लिए ब्रेसलेट्स तथा नेकलेस भी स्टॉल पर उपलब्ध हैं।

इन उत्पादों में पारंपरिक मिस्री डिज़ाइन की झलक साफ नजर आती है। साथ ही, इन्हें आधुनिक उपयोग के अनुरूप तैयार किया गया है, जिससे ये हर आयु वर्ग के लोगों को पसंद आ रहे हैं।

सिरेमिक उत्पाद भी बने आकर्षण

शीशल के साथ-साथ स्टॉल पर सिरेमिक से बने टी-सेट और बाउल भी प्रदर्शित किए गए हैं। इन सिरेमिक उत्पादों की कारीगरी को पर्यटक सराह रहे हैं। इनकी बनावट में सादगी और कलात्मकता का संतुलन दिखाई देता है।

कई पर्यटक इन वस्तुओं को उपहार के रूप में खरीद रहे हैं। इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय शिल्प को लेकर लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है।

पुश्तैनी कला की विरासत

मिस्र से आए शिल्पकार गोहारी ने बताया कि शीशल कला उनका पुश्तैनी कार्य है। यह हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता आया है। उन्होंने कहा कि इस कला को संरक्षित रखना उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मेलों से शिल्पकारों को अपनी कला को नए दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। इससे पारंपरिक शिल्प को वैश्विक पहचान मिलती है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व

शिल्पकारों ने बताया कि इस मेले में भागीदारी अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय सहयोग से संभव हो पाई है। ऐसे आयोजनों से विभिन्न देशों की कलाएं एक-दूसरे के करीब आती हैं। इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है।

मेले का यह मंच शिल्पकारों को न केवल अपने उत्पाद बेचने का अवसर देता है, बल्कि अन्य देशों की कला और तकनीकों को समझने का भी मौका प्रदान करता है।

पर्यटकों की बढ़ती रुचि

अंतरराष्ट्रीय पवेलियन में मिस्र के स्टॉल पर दिनभर पर्यटकों की आवाजाही बनी रहती है। लोग न केवल खरीदारी कर रहे हैं, बल्कि इन उत्पादों की निर्माण प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी ले रहे हैं।

कई पर्यटक यह मानते हैं कि इस तरह की विदेशी हस्तकलाएं मेले को और भी खास बनाती हैं। इससे मेले की विविधता और आकर्षण बढ़ता है।

सांस्कृतिक मेल-जोल का मंच

39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला विभिन्न संस्कृतियों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम कर रहा है। मिस्र की शीशल कला इसका एक अच्छा उदाहरण है। यह कला दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक हुनर आधुनिक समय में भी अपनी जगह बनाए हुए है।

इस तरह के आयोजनों से न केवल शिल्पकारों को लाभ मिलता है, बल्कि दर्शकों को भी दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों को करीब से देखने का अवसर मिलता है। आने वाले दिनों में भी अंतरराष्ट्रीय पवेलियन पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बना रहने की उम्मीद है।

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