भारत।
गणतंत्र दिवस का अवसर देश को आत्ममंथन का संदेश देता है। परेड, सांस्कृतिक झांकियां और औपचारिक भाषणों के बीच यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय गणतंत्र आज अपने मूल उद्देश्यों को पूरी तरह निभा पा रहा है। वर्ष 2026 के करीब आते-आते भारत ने कई उपलब्धियां अर्जित की हैं, लेकिन साथ ही अनेक गंभीर सामाजिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक चुनौतियां भी सामने आई हैं।
26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने भारत को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का मार्ग दिखाया। सात दशकों से अधिक की इस यात्रा में भारत वैश्विक मंच पर एक प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में उभरा है। फिर भी, आर्थिक प्रगति के बावजूद सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा और संस्थागत भरोसे जैसे मुद्दे गणतंत्र की मजबूती पर प्रश्न खड़े करते हैं।
आर्थिक प्रगति के साथ बढ़ती असमानता
भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुकी है, लेकिन आर्थिक लाभ का समान वितरण अब भी एक बड़ी चुनौती है। शहरी क्षेत्रों में आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है, वहीं ग्रामीण भारत में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी बनी हुई है। यह असंतुलन सामाजिक तनाव को जन्म देता है और दीर्घकालिक विकास के लिए चिंता का विषय है।
भ्रष्टाचार और संस्थागत विश्वास की चुनौती
भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बना हुआ है। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन जमीनी स्तर पर ईमानदार शासन सुनिश्चित करना अब भी कठिन है। जब नागरिकों का भरोसा संस्थाओं से कमजोर होता है, तो लोकतंत्र की जड़ें प्रभावित होती हैं।
राजनीति और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रश्न
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी भारत की ताकत रही है, लेकिन राजनीति का अपराधीकरण, धनबल का बढ़ता प्रभाव और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलती गलत सूचनाएं चिंता बढ़ाती हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी हो और जनप्रतिनिधि जवाबदेह हों।
महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय
महिला सुरक्षा आज भी एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बनी हुई है। कानूनों और योजनाओं के बावजूद, महिलाओं के प्रति अपराध और असुरक्षा की भावना समाज की प्रगति में बाधा है। इसी प्रकार, शिक्षा और रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करना भी गणतंत्र के मूल सिद्धांतों से जुड़ा प्रश्न है।
युवाओं और रोजगार की चुनौती
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन बेरोजगारी और कौशल अंतर इस शक्ति को कमजोर कर रहे हैं। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना, कौशल विकास और नवाचार को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है, ताकि युवा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
समाधान की दिशा और भविष्य का संकल्प
गणतंत्र की चुनौतियों का समाधान संभव है, बशर्ते नीति-निर्माण में पारदर्शिता, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाए। तकनीक का सकारात्मक उपयोग, न्यायिक सुधार, महिला सशक्तिकरण और युवाओं को अवसर प्रदान कर भारत अपने गणतंत्र को और मजबूत बना सकता है।
आत्मचिंतन का दिन है गणतंत्र दिवस
गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। उपलब्धियों पर गर्व करते हुए, कमियों को स्वीकार करना ही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। यदि हम संविधान की भावना को व्यवहार में उतारें, तो भारतीय गणतंत्र आने वाले वर्षों में और अधिक सशक्त बन सकता है।
जय हिंद, जय भारत।
✍️ लेखक परिचय
डॉ. प्रियंका सौरभ राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। वे एक कवयित्री और सामाजिक चिंतक हैं तथा समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन करती हैं।

