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संवाददाता – Divyanshu Ojha (Journalist)

फरीदाबाद में साइबर अपराधियों द्वारा अपनाए जा रहे नए-नए तरीकों के बीच डिजिटल अरेस्ट के नाम पर की जा रही ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है। इस मामले में पीड़ित को सरकारी एजेंसी का डर दिखाकर लगभग 8 लाख 93 हजार रुपये की ठगी की गई। शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए साइबर थाना NIT की टीम ने ठगी की रकम प्राप्त करने वाले खाताधारक को गिरफ्तार कर लिया है।

यह मामला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि साइबर अपराधी किस तरह सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर आम नागरिकों को मानसिक दबाव में डालकर ठगी को अंजाम दे रहे हैं।


व्हाट्सएप कॉल से शुरू हुई ठगी की साजिश

पुलिस प्रवक्ता के अनुसार, NIT फरीदाबाद निवासी एक व्यक्ति ने साइबर थाना में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने बताया कि 9 नवंबर 2025 को उसके व्हाट्सएप नंबर पर एक अज्ञात कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने स्वयं को पंजाब पुलिस का इंस्पेक्टर बताया।

कॉल करने वाले ने शिकायतकर्ता को यह कहकर डराया कि उसका आधार कार्ड किसी आतंकवादी गतिविधि में इस्तेमाल हुआ है। इस बात से शिकायतकर्ता घबरा गया और कॉल करने वाले की बातों में आ गया।


वीडियो कॉल और मानसिक दबाव

शिकायतकर्ता ने बताया कि इसके बाद आरोपी ने वीडियो कॉल की और उसे तथा उसकी पत्नी को निर्देश दिया कि वे किसी को इस बारे में न बताएं और घर से बाहर न निकलें। आरोपी ने खुद को सरकारी अधिकारी बताते हुए ऐसा माहौल बनाया, जिससे शिकायतकर्ता को लगा कि वह किसी गंभीर कानूनी संकट में फंस गया है।

इसी मानसिक दबाव की स्थिति को साइबर अपराधी आमतौर पर डिजिटल अरेस्ट कहते हैं, जिसमें पीड़ित को डराकर निर्देशों का पालन करवाया जाता है।


फर्जी ATS ऐप के जरिए ठगी

अगले दिन यानी 10 नवंबर 2025 को उसी नंबर से दोबारा कॉल आई। इस बार आरोपी ने शिकायतकर्ता को एक ATS ऐप डाउनलोड करवाया। ऐप पर सरकारी विभाग जैसा लोगो लगा हुआ था, जिससे वह असली प्रतीत हो रही थी।

ऐप डाउनलोड करवाने के बाद ठगों ने शिकायतकर्ता से उसके बैंक खाते से जुड़ी जानकारियां भरवा लीं। पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि यह प्रक्रिया जांच के लिए जरूरी है।


RTGS के जरिए 8,93,000 रुपये ट्रांसफर

जानकारी हासिल करने के बाद ठगों ने शिकायतकर्ता से RTGS के माध्यम से अलग-अलग ट्रांजैक्शन में कुल 8,93,000 रुपये ट्रांसफर करवा लिए। कुछ समय बाद जब शिकायतकर्ता को ठगी का एहसास हुआ, तब तक आरोपी संपर्क से बाहर हो चुके थे।

इसके बाद पीड़ित ने साइबर थाना NIT में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर संबंधित धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।


साइबर थाना NIT की त्वरित कार्रवाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए साइबर थाना NIT की टीम ने तकनीकी साक्ष्यों और बैंक ट्रांजैक्शन की जांच शुरू की। जांच के दौरान सामने आया कि ठगी की पूरी रकम एक बैंक खाते में जमा हुई है।

तकनीकी विश्लेषण और दस्तावेज़ों के आधार पर पुलिस ने खाताधारक की पहचान की।


खाताधारक गिरफ्तार

जांच के बाद पुलिस ने परमार भावेश हरखाभाई (24 वर्ष), निवासी जिला सुरेंद्रनगर, गुजरात को गिरफ्तार किया।

पुलिस पूछताछ में सामने आया कि आरोपी खाताधारक है और उसने अपना बैंक खाता ठगों को इस्तेमाल के लिए दिया था। आरोपी पेशे से कारपेंटर का काम करता है।


खाते में आए थे पूरे 8 लाख 93 हजार रुपये

पुलिस प्रवक्ता के अनुसार, आरोपी के खाते में ठगी के पूरे 8,93,000 रुपये ट्रांसफर हुए थे। पुलिस ने आरोपी को माननीय न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया है।

रिमांड के दौरान पुलिस यह जांच कर रही है कि:

  • आरोपी ने खाता किन-किन लोगों को उपलब्ध कराया

  • क्या वह किसी बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का हिस्सा है

  • ठगी की रकम आगे कहां और किसे ट्रांसफर की गई


डिजिटल अरेस्ट क्या है?

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यह साइबर अपराधियों द्वारा अपनाया गया एक तरीका है, जिसमें:

  • खुद को पुलिस, CBI, ED, ATS या अन्य एजेंसी का अधिकारी बताया जाता है

  • वीडियो कॉल और फर्जी ऐप के जरिए डर का माहौल बनाया जाता है

  • पीड़ित को अलग-थलग कर मानसिक दबाव में रखा जाता है

  • पैसों की मांग “जांच” या “वेरिफिकेशन” के नाम पर की जाती है


पुलिस की आमजन से अपील

फरीदाबाद पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि:

  • कोई भी सरकारी एजेंसी व्हाट्सएप कॉल या वीडियो कॉल पर जांच नहीं करती

  • आधार, बैंक या OTP जैसी जानकारी किसी को न दें

  • किसी भी डराने वाली कॉल या ऐप पर भरोसा न करें

  • संदेह होने पर तुरंत साइबर पुलिस से संपर्क करें

साइबर अपराध की शिकायत के लिए:

  • नजदीकी साइबर थाना

  • राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930

  • या www.cybercrime.gov.in का उपयोग करें


समाज के लिए चेतावनी

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की ठगी में पढ़े-लिखे और जागरूक लोग भी फंस जाते हैं, क्योंकि अपराधी डर और जल्दबाज़ी का माहौल बनाते हैं। इसलिए किसी भी स्थिति में घबराकर फैसला न लें।


निष्कर्ष

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हुई यह ठगी एक गंभीर चेतावनी है कि साइबर अपराधी अब तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। साइबर थाना NIT की त्वरित कार्रवाई से खाताधारक की गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि पुलिस ऐसे मामलों को गंभीरता से ले रही है। लेकिन इस तरह के अपराधों से बचाव के लिए नागरिकों की सतर्कता और जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण हथियार है।

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