फरीदाबाद।
भारत का गणतंत्र आज 77 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुका है। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारतीय संविधान ने स्वतंत्र भारत को एक स्पष्ट दिशा दी—जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय को सर्वोच्च मूल्य माना गया। यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी है कि हमने एक राष्ट्र के रूप में क्या उपलब्धियां हासिल कीं और किन चुनौतियों का सामना अभी भी शेष है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने साहित्य, विज्ञान, कृषि, खेल और तकनीक जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की। अंतरिक्ष विज्ञान में चंद्रयान मिशन, डिजिटल भुगतान प्रणाली में यूपीआई, खेलों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ती सफलता और आर्थिक मोर्चे पर तेज विकास दर ने भारत को वैश्विक पहचान दिलाई है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है, जो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में सहायक रहा है।
विविधता में एकता: गणतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि
भारत के सामने प्रारंभिक चुनौती थी—अपार विविधता के बीच एकता बनाए रखना। अनेक भाषाएं, धर्म, संस्कृतियां और परंपराएं होने के बावजूद संविधान ने संघीय ढांचे के माध्यम से देश को एकजुट रखा। भाषाई राज्यों का पुनर्गठन, संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और न्यायपालिका की भूमिका ने लोकतांत्रिक संतुलन को बनाए रखा। तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत का एकजुट रहना अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
लोकतंत्र की मजबूती और संस्थाओं की भूमिका
भारतीय लोकतंत्र ने समय के साथ खुद को सुदृढ़ किया है। वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र चुनाव, मौलिक अधिकार और न्यायपालिका की सक्रियता ने लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखा। सूचना का अधिकार, पंचायती राज में महिला आरक्षण और पारदर्शिता से जुड़े सुधारों ने आम नागरिक की भागीदारी बढ़ाई। हालांकि आपातकाल जैसे दौर भी आए, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं ने खुद को पुनर्स्थापित किया।
विकास की यात्रा और सामाजिक चुनौतियां
आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक असमानता एक बड़ी चुनौती बनी रही। कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार हुए, लेकिन ग्रामीण-शहरी अंतर, बेरोजगारी और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएं भी सामने आईं। करोड़ों लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले, यह उपलब्धि गर्व का विषय है, लेकिन समान अवसर सुनिश्चित करना अभी भी जरूरी है।
भविष्य का संकल्प: समाधान और रास्ते
गणतंत्र की सफलता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि समस्याओं के समाधान में निहित है। पारदर्शी शासन, सामाजिक समरसता, महिला सुरक्षा, युवाओं के लिए रोजगार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर निरंतर कार्य करना आवश्यक है। तकनीक और नवाचार के माध्यम से शासन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
आत्मचिंतन का अवसर है गणतंत्र दिवस
गणतंत्र दिवस केवल परेड और ध्वजारोहण तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम संविधान के मूल्यों को कितनी मजबूती से अपना रहे हैं। युवा शक्ति, लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ ही विकसित भारत का सपना साकार किया जा सकता है।
भारतीय गणतंत्र ने संघर्षों के बीच भी उम्मीद को जीवित रखा है। अब आवश्यकता है कि हम एकजुट होकर भविष्य की ओर बढ़ें और संविधान की भावना को जीवन में उतारें।
जय हिंद, जय भारत।
डॉ. सत्यवान सौरभ राजनीति विज्ञान में पीएचडी हैं। वे एक कवि एवं सामाजिक विचारक हैं और समकालीन विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।

