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फरीदाबाद, 1 फरवरी।

39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला—2026 में इस बार हस्तशिल्प की परंपरा और पीढ़ियों से चली आ रही कला का जीवंत उदाहरण देखने को मिल रहा है। मेले में दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिल्पकार बालकिशन अपनी पीतल से बनी मूर्तियों के साथ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। स्टॉल नंबर 142 पर सजी उनकी कलाकृतियां न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय शिल्प परंपरा की सजीव पहचान भी प्रस्तुत करती हैं।


चार पीढ़ियों से चली आ रही शिल्प परंपरा

दिल्ली से आए शिल्पकार बालकिशन ने बताया कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से पीतल की मूर्तियां बनाने के कार्य से जुड़ा हुआ है। पारिवारिक विरासत के रूप में मिली यह कला आज भी पारंपरिक तरीकों से ही तैयार की जाती है, जिसमें धैर्य, सूक्ष्म नक्काशी और शुद्धता को प्राथमिकता दी जाती है। उन्होंने बताया कि सूरजकुंड मेला उनके लिए केवल एक बाजार नहीं, बल्कि अपनी कला और विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का मंच है।

बालकिशन पिछले 38 वर्षों से लगातार सूरजकुंड शिल्प मेले में भाग लेते आ रहे हैं। उनका कहना है कि समय के साथ डिज़ाइन और मांग में बदलाव जरूर आया है, लेकिन पीतल की पारंपरिक मूर्तियों के प्रति लोगों की आस्था और आकर्षण आज भी बना हुआ है।


पीतल की मूर्तियों की विशेषता

बालकिशन की स्टॉल पर उपलब्ध मूर्तियों की खासियत उनकी—

  • बारीक नक्काशी

  • संतुलित आकृतियां

  • शुद्ध पीतल का उपयोग

  • पारंपरिक शिल्प तकनीक

है। उनकी स्टॉल पर देवी-देवताओं की सजीव मूर्तियां उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत 200 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक है। अलग-अलग आकार और डिज़ाइन की ये मूर्तियां घरेलू पूजा, सजावट और उपहार के रूप में खरीदी जा रही हैं।


राष्ट्रीय स्तर पर मिल चुका है सम्मान

अपनी उत्कृष्ट शिल्पकला और निरंतर समर्पण के लिए बालकिशन को कपड़ा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। यह पुरस्कार उनकी कला की गुणवत्ता और परंपरा के संरक्षण के प्रति उनके योगदान को दर्शाता है।

उनका कहना है कि उनकी मूर्तियों में केवल धातु नहीं, बल्कि चार पीढ़ियों का अनुभव, साधना और श्रद्धा समाहित होती है। यही कारण है कि उनकी कृतियां केवल उत्पाद नहीं, बल्कि कला के रूप में देखी जाती हैं।


पर्यटकों में दिख रहा खासा उत्साह

शिल्प मेले में आने वाले देश-विदेश के पर्यटक बालकिशन की स्टॉल पर रुककर—

  • मूर्तियों की बारीकियों को समझ रहे हैं

  • उनकी शिल्प यात्रा के बारे में जानकारी ले रहे हैं

  • पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया को जानने में रुचि दिखा रहे हैं

कई पर्यटक न केवल खरीदारी कर रहे हैं, बल्कि शिल्पकार से संवाद कर भारतीय हस्तशिल्प की गहराई को भी महसूस कर रहे हैं।


सूरजकुंड मेला: परंपरा और कारीगरों का मंच

सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला वर्षों से कारीगरों और शिल्पकारों को सीधा मंच प्रदान करता रहा है। यहां पारंपरिक कला को न केवल संरक्षण मिलता है, बल्कि उसे वैश्विक पहचान भी मिलती है। बालकिशन जैसे शिल्पकार इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे पीढ़ियों से चली आ रही कला आज भी प्रासंगिक और सराही जा रही है।

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