शब्दों से सेनाएं नहीं चलतीं,
शेर की खाल पहनकर भेड़िए भी गरजते हैं,
मंचों से चीखना आसान है,
पर सरहद की ठंड में हड्डियां चटकाती सच्चाई,
सिर्फ सैनिक का हौसला जानता है।

मंत्री महोदय, आओ सीमा पर,
जहाँ भाषण की नहीं,
बलिदान की भाषा चलती है,
जहाँ न ताली बजती है, न झूठे वादों की फसल लहलहाती है।

तलवार की धार पर राजनीति करना,
नोटों से वोटों तक का खेल खेलना,
यहाँ नहीं चलता,
यहाँ लहू का हिसाब देना पड़ता है,
हर कदम नापकर रखना होता है,
क्योंकि गलती का अर्थ सिर्फ हार नहीं,
सहारा देतीं हड्डियों का चूर होना भी है।

जब खुद की छाती पर बरसें गोलियाँ,
तब ही समझ आता है,
कि कागज़ पर खींची लकीर और सीने पर खिंची गोली का फर्क क्या होता है।

शायद तभी शांति तुम्हारी पहली पसंद बन जाए,
जब तुम्हें भी हथियार थामना पड़े,
और अपने भाषणों के घाव खुद के सीने पर सहने पड़े।

-डॉ. सत्यवान सौरभ —

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