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संवाददाता – Divyanshu Ojha (Journalist)

फरीदाबाद जिले के तिगांव विधानसभा क्षेत्र में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज होती नजर आ रही है। इसी क्रम में तिगांव विधानसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्याशी रोहित नागर ने क्षेत्र में “मनरेगा बचाओ संघर्ष अभियान” के तहत जनसंपर्क कार्यक्रम चलाया और ग्रामीणों से संवाद किया।

इस अभियान के दौरान रोहित नागर ने मनरेगा से जुड़े मौजूदा प्रावधानों, इसके क्रियान्वयन और संभावित प्रभावों को लेकर अपनी पार्टी का पक्ष रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा किए जा रहे बदलावों से मनरेगा की मूल भावना प्रभावित हो रही है, जिसका सीधा असर ग्रामीण गरीबों, मजदूरों और महिलाओं पर पड़ सकता है।


“मनरेगा गरीबों के अधिकारों से जुड़ी योजना” – रोहित नागर

जनसंपर्क अभियान के दौरान रोहित नागर ने कहा कि मनरेगा केवल एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों के लिए कानूनी अधिकार के रूप में लाई गई थी। उन्होंने यह दावा किया कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में मनरेगा के तहत हर पंजीकृत परिवार को न्यूनतम 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करने की कानूनी गारंटी दी गई थी।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना मजदूरों के लिए आय का स्थायी सहारा बनी थी और इससे गांवों में पलायन को भी काफी हद तक रोका गया। उनके अनुसार, यदि इस योजना को कमजोर किया गया, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव उन परिवारों पर पड़ेगा, जो पूरी तरह दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं।


“विकसित भारत” बनाम जमीनी सच्चाई

रोहित नागर ने कहा कि एक ओर “विकसित भारत” की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े मुद्दे सामने आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव कर रोजगार की गारंटी को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं, लेकिन कांग्रेस का मानना है कि ग्रामीण रोजगार से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।


मनरेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मनरेगा देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजनाओं में से एक रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना, बुनियादी ढांचे का विकास करना और गरीब परिवारों को न्यूनतम आय सुरक्षा देना रहा है।

रोहित नागर ने अपने संबोधन में कहा कि यदि मनरेगा की मांग-आधारित प्रकृति कमजोर होती है, तो पंचायत स्तर पर रोजगार की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस इस विषय को केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सरोकार से जुड़ा विषय मानती है।


“महात्मा गांधी के विचारों से जुड़ी योजना” का उल्लेख

अपने संबोधन में रोहित नागर ने यह भी कहा कि महात्मा गांधी का सपना गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का था और मनरेगा उसी सोच से प्रेरित योजना रही है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास, स्वावलंबन और रोजगार की गारंटी जैसे पहलू गांधीवादी विचारधारा से जुड़े रहे हैं।

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मनरेगा से महात्मा गांधी के नाम को हटाने को लेकर जो चर्चाएं हुईं, वे इसी वैचारिक टकराव को दर्शाती हैं। हालांकि, इस विषय पर सरकार की ओर से अलग-अलग समय पर स्पष्टीकरण भी दिए जाते रहे हैं।


जनसंपर्क अभियान के दौरान ग्रामीणों की प्रतिक्रिया

तिगांव विधानसभा क्षेत्र में आयोजित इस अभियान के दौरान कई गांवों में ग्रामीणों ने रोहित नागर और कांग्रेस कार्यकर्ताओं का स्वागत किया। कार्यक्रम के दौरान लोगों ने रोजगार, मजदूरी भुगतान, कार्य-दिवसों की संख्या और स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध होने जैसे मुद्दों पर सवाल भी पूछे।

रोहित नागर ने कहा कि इस तरह के संवाद से जमीनी समस्याओं को समझने में मदद मिलती है और पार्टी अपनी नीतियों को उसी के अनुसार आगे बढ़ाती है।


कांग्रेस का रुख: लोकतांत्रिक तरीके से विरोध

रोहित नागर ने कहा कि कांग्रेस पार्टी मनरेगा को कमजोर करने या समाप्त करने की किसी भी कोशिश का लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से विरोध करेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी का उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि ग्रामीण मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करना है।

उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करती रहेगी, ताकि वे अपनी योजनाओं और अधिकारों के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकें।


अभियान में मौजूद रहे स्थानीय नेता

इस अवसर पर रोहित नागर के साथ तिगांव विधानसभा अध्यक्ष पंकज सिंह, विजय ठेकेदार, विजय बिदूड़ी, रोहताश चौधरी, हामिद खान सहित कई स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे। सभी ने इस अभियान को ग्रामीण संवाद का माध्यम बताया।


राजनीतिक संदर्भ में मनरेगा

मनरेगा को लेकर देशभर में समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है। जहां एक ओर इसे ग्रामीण रोजगार का मजबूत आधार माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके क्रियान्वयन, बजट और प्रभावशीलता को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं।

राजनीतिक दलों के बीच इस तरह की बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती है, जिससे नीतियों पर सार्वजनिक विमर्श को बल मिलता है।


निष्कर्ष

तिगांव विधानसभा क्षेत्र में चलाया गया “मनरेगा बचाओ संघर्ष अभियान” कांग्रेस की ओर से ग्रामीण रोजगार से जुड़े मुद्दों को सामने लाने का प्रयास है। रोहित नागर द्वारा उठाए गए सवाल और दावे मनरेगा को लेकर जारी राजनीतिक बहस को दर्शाते हैं। ऐसे अभियानों से ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं और नीतियों पर चर्चा होती है, जो लोकतांत्रिक संवाद के लिए आवश्यक मानी जाती है।

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