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फरीदाबाद | 05 फरवरी 2026

39वें अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले में यूपी के मूंज-काश हस्तशिल्प बने आकर्षण का केंद्र

फरीदाबाद में आयोजित 39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला देश की पारंपरिक कलाओं और ग्रामीण हस्तशिल्प को मंच प्रदान कर रहा है। मेले में अलग-अलग राज्यों से आए कारीगर अपनी विशिष्ट कला और उत्पादों के माध्यम से भारतीय संस्कृति की विविधता को प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी क्रम में थीम स्टेट उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से आए शिल्पकारों के मूंज और काश से बने उत्पाद दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं।

इस मेले में स्टॉल नंबर 312 पर शिल्पकार मुनेन्द्र कुमार द्वारा तैयार किए गए हस्तनिर्मित उत्पाद बड़ी संख्या में प्रदर्शित किए गए हैं। प्राकृतिक घास से बने ये उत्पाद अपनी सादगी, मजबूती और उपयोगिता के कारण लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन उत्पादों का निर्माण पूरी तरह पारंपरिक तकनीकों से किया गया है।

मूंज और काश शिल्प की विशेषता

शिल्पकार मुनेन्द्र कुमार ने बताया कि मूंज और काश घास नदियों के किनारे उगने वाली प्राकृतिक सामग्री है। इनसे बने उत्पाद न केवल टिकाऊ होते हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित माने जाते हैं। प्लास्टिक और सिंथेटिक वस्तुओं के विकल्प के रूप में इन हस्तशिल्प उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने बताया कि उनके स्टॉल पर करीब 30 से 35 प्रकार के अलग-अलग हस्तनिर्मित आइटम उपलब्ध हैं। इनकी कीमत 150 रुपये से लेकर 1200 रुपये तक रखी गई है। इसका उद्देश्य यह है कि हर वर्ग के लोग इन उत्पादों को आसानी से खरीद सकें।

पारंपरिक कला और आधुनिक जरूरतों का मेल

स्टॉल पर प्रदर्शित उत्पादों में फल टोकरी, पूजा डोर, केश रोल, फ्लावर पॉट, पूजा थाल, फैंसी डलिया, लॉन्ड्री बास्केट, सजावटी टोकरियां, घरेलू भंडारण टोकरी, हैंडमेड ट्रे और पूजा सामग्री रखने के लिए उपयोगी बास्केट शामिल हैं। इन सभी उत्पादों में पारंपरिक शिल्पकला के साथ आधुनिक उपयोगिता का संतुलन दिखाई देता है।

डिजाइन को इस तरह तैयार किया गया है कि ये उत्पाद घर की सजावट के साथ-साथ रोजमर्रा के उपयोग में भी आ सकें। यही वजह है कि युवा वर्ग से लेकर बुजुर्गों तक, सभी इन वस्तुओं में रुचि ले रहे हैं।

महिलाओं को मिल रहा रोजगार

मुनेन्द्र कुमार ने बताया कि इस हस्तशिल्प कार्य को संगठित रूप से आगे बढ़ाने में डालिमिया ग्रुप का सहयोग मिल रहा है। इस समूह से लगभग 250 ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं मूंज और काश से बने उत्पादों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

इस कार्य के माध्यम से महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल रहा है। इससे उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है। साथ ही यह पहल महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

ग्रामीण महिलाओं के लिए यह हस्तशिल्प कार्य केवल आय का साधन नहीं है। यह उन्हें अपने कौशल को पहचानने और समाज में सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी देता है। महिलाएं पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक बाजार से जोड़कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं।

शिल्पकारों का मानना है कि ऐसे मेलों के माध्यम से उनके उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं।

पर्यावरण के प्रति जागरूकता

मूंज और काश से बने उत्पाद पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं। ये पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री से तैयार किए जाते हैं और लंबे समय तक उपयोग में आ सकते हैं। उपयोग के बाद भी ये आसानी से नष्ट हो जाते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता।

मेले में आने वाले कई पर्यटक इन उत्पादों को पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के रूप में देख रहे हैं। यही कारण है कि इनकी बिक्री में भी अच्छी रुचि देखने को मिल रही है।

शिल्प मेले की भूमिका

39वां अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला कारीगरों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संपर्क स्थापित कर रहा है। यहां कारीगर अपने अनुभव साझा कर रहे हैं और लोग पारंपरिक कलाओं को नजदीक से समझ पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मूंज-काश हस्तशिल्प इस मेले में आत्मनिर्भर भारत की सोच को मजबूत करते नजर आ रहे हैं। यह पहल न केवल पारंपरिक कला को संरक्षित कर रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रही है।

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