
फरीदाबाद । सतयुग दर्शन वसुन्धरा में आयोजित राम नवमी यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस सजनों को जाग्रत करते हुए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ अनुरूप एक नृत्य नाटिका के माध्यम से समझाया गया कि निर्गुण, निर्विशेष, विराट् रूप परमेश्वर परब्रह्मवाचक ओंकार शब्द में स्थित व स्थिर है। जैसा कि कहा भी गया है:-
मूल मंत्र जो आद् अक्षर ओ३म् है, वह अमर आत्मा है
और इस आत्मा में परमपिता परमात्मा हैं।
यानि यही ओ३म् ही आनन्द यानि दिव्य अखंड सुख या आध्यात्मिक प्रसन्नता का स्रोत है। इस परम आनन्द स्रोत में जिसका मन रम जाता है उसके सभी दु:ख-क्लेशों का हरण हो जाता है और वह सर्वव्यापक अपने सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप का बोध कर कह उठता है:-
ओ३म् आनन्दम, ओ३म् आनन्दम, ओ३म् आनन्दम ओ३म्।
हे दुःख भंजन, हे दुःख भंजन, हे दुःख भंजन ओ३म्।
सर्वव्यापी ओ३म्, ओ३म् आनन्दम ओ३म्
इस महत्त्व के दृष्टिगत ही न केवल सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अपितु प्रत्येक आती-जाती श्वास में सदा शब्द ब्रह्म यानि ओ३म् की ध्वनि गुंजायमान होती रहती है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यही ब्रह्मांड व श्वास-प्रश्वास की प्रत्येक गतिविधि को नियंत्रित करती है। जो इस अव्यक्त शब्द ध्वनि के साथ अपने ख़्याल का ध्यानपूर्वक नाता जोड़ इसमें लय हो जाता है, वह आत्मज्ञानी ओ३म् शब्द में प्रकाश रहे ज्योति स्वरूप परमात्मा का बोध कर कह उठता है:-
ओ३म् ओ३म्, ओ३म् विच जड़या होया हां।
ओ३म् ओ३म्, ओ३म् विच खड़ा होया हां॥
आशय यह है कि यही ओंकार ही सत् नाम है तथा समस्त चराचर जगत का अधिष्ठान है। इसकी उपासना, ब्रह्म की उपासना है जिसके आलोक से निर्गुण आत्मतत्व यानि दिव्य ज्ञान रूप ज्योति का साक्षात्कार होता है और व्यग्र मन-चित्त एकाग्र व शांत हो स्थिर हो जाता है। इस तरह यही अंधकार का विनाशक, सत्यस्वरूप का प्रकाशक, अज्ञानियों एवं पापचारियों का विनाशक, दाता, आधारस्थल तथा सृष्टि को बढ़ाने वाला हैं और जीवन के परम पुरूषार्थों यथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का प्रदायक है।
यही नहीं इसी शब्द में ही सृष्टि का समस्त ज्ञान विज्ञान सम्मोहा हुआ है और इसी से ही ब्रह्म, जीव, जगत के सत्य यानि आध्यात्मिक (आत्मिक) व भौतिक ज्ञान का प्रकटन हो रहा है। यही यथार्थ में दिव्यता की खिड़की खोलने की कुंजी है और यही अन्दरूनी व बैहरूनी उन्नति का एकमात्र साधन है। यही सुरत व शब्द के मिलन का व विलीन होने का केन्द्र बिन्दु है यानि शून्य स्थान है व यहीं पहुँच जीव विश्राम पाता है।
अत: इस महत्ता को जानते-समझते हुए इस आद् अक्षर ओ३म् को जप-तप यानि आध्यात्मिक साधना/तपस्या व पूजा यानि उपासना/आराधना का सर्वश्रेष्ठ साधन मानकर इसका ख़्याल से ध्यानपूर्वक घड़ी की टक-टक की तरह अफुरता से निरंतर सिमरन करो। इस तरह इसके अजपा जाप द्वारा अपना हृदय प्रकाशित रख, मन तथा इन्द्रियों को वश में करो और एक समवृत्ति जितेन्द्रिय साधक की भांति, चित्त को भोग-विलास की वृत्ति से बचाए रखते हुए, उसमें सत्य का संचार करो। जानो ऐसा करने पर ही विवेकशक्ति का जागरण होगा व मन में मिथ्या ज्ञान से उत्पन्न हुए भ्रमपूर्ण व कल्पित वातावरण का नाश होगा। तभी आप मन को संकल्प रहित रखते हुए, अपने वास्तविक ज्ञान व गुण/धर्म को पहचान, यथार्थपूर्ण जीवन जीने के योग्य बन सकोगे और आत्मविजय पा यानि मोक्ष प्राप्ति के सच्चे अधिकारी बन सबको कह सकोगे:-
ओ३म है जप तप ओ३म् है पूजा ओ३म् दा है विस्तार जी।
जपो ओ३म्-कार शब्द ओ३म्-कार जी।
इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए अंत में उन्होने हर सजन से ऐसा सुनिश्चित करने की प्रार्थना करी ताकि वे शारीरिक यानि काम जनित भाव-स्वभावों यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जो हर विकृति के प्रतीक हैं उनसे मुक्ति पा पुन: सम, संतोष-धैर्य का सिंगार पहन, सच्चाई धर्म के निष्काम रास्ते पर स्थिरता से बने रह परोपकार प्रवृति में ढ़ल सकें। इस संदर्भ में उन्होंने स्पष्ब् किया कि यही श्रेष्ठ मानव की वास्तविक पहचान है व युग परिवर्तन का आधार है। इसलिए आओ त्रेता, द्वापर की बातें छोड़ व कलियुग की तरफ से मुख मोड़ सब मिलकर बढ़ चले सतयुग की ओर…..।