फरीदाबाद, 04 फरवरी 2026
हरियाणा के प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजन 39वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड आत्मनिर्भर शिल्प मेले में मंगलवार की शाम संगीत प्रेमियों के लिए विशेष रही। इस अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या में गायन प्रस्तुतियों ने मेले के वातावरण को संगीतमय बना दिया। बड़ी संख्या में मौजूद दर्शकों ने कार्यक्रम का शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण ढंग से आनंद लिया।
यह सांस्कृतिक संध्या कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग, हरियाणा और हरियाणा पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। कार्यक्रम का आयोजन मेले की मुख्य चौपाल पर किया गया, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से आए पर्यटक और स्थानीय दर्शक बड़ी संख्या में मौजूद रहे। इस आयोजन का उद्देश्य लोक कला, संगीत और सांस्कृतिक विविधता को मंच प्रदान करना रहा।
सांस्कृतिक संध्या का आयोजन और पृष्ठभूमि
सूरजकुंड शिल्प मेला हर वर्ष अपनी हस्तशिल्प प्रदर्शनी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है। इसके साथ ही यह मेला भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर भी देता है। इसी क्रम में प्रतिदिन विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया जा रहा है।
मंगलवार की शाम आयोजित कार्यक्रम में संगीत को केंद्र में रखा गया। आयोजकों के अनुसार, ऐसे कार्यक्रमों से न केवल कलाकारों को मंच मिलता है, बल्कि दर्शकों को भी अलग-अलग संगीत शैलियों से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। इसके अलावा, सांस्कृतिक गतिविधियों से मेले की पहचान और आकर्षण और मजबूत होता है।
मुख्य प्रस्तुति और कलाकार
इस सांस्कृतिक संध्या की मुख्य प्रस्तुति प्रसिद्ध पार्श्व गायिका तरन्नुम मलिक जैन द्वारा दी गई। उन्होंने अपने गायन के माध्यम से कार्यक्रम को संतुलित और सुनियोजित रूप प्रदान किया। उनकी प्रस्तुतियों में शास्त्रीय स्पर्श के साथ लोकप्रिय गीतों का समावेश रहा, जिससे हर आयु वर्ग के दर्शक जुड़ सके।
कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कुछ चुनिंदा लोकप्रिय गीतों से की। इन गीतों के माध्यम से उन्होंने कार्यक्रम की लय तय की। धीरे-धीरे माहौल पूरी तरह संगीत में ढल गया। इसके बाद प्रस्तुत किए गए गीतों ने दर्शकों की भागीदारी को और बढ़ाया।
गीतों का चयन और प्रस्तुति शैली
तरन्नुम मलिक जैन द्वारा प्रस्तुत गीतों का चयन संतुलित रहा। उन्होंने ऐसे गीतों को शामिल किया, जो लंबे समय से श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हैं। इससे दर्शकों को परिचित धुनों के साथ जुड़ने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने “सैयारा”, “लग जा गले के फिर ये हसीं पल” और “बड़े अच्छे लगते हैं” जैसे गीत प्रस्तुत किए। इन गीतों ने शुरुआत से ही दर्शकों का ध्यान बनाए रखा। इसके बाद “कुछ न कहो कुछ भी न कहो” और “आज की रात होना है क्या” जैसे गीतों ने कार्यक्रम में निरंतरता बनाए रखी।
उनकी प्रस्तुति में आवाज की स्पष्टता और तालमेल देखने को मिला। इसके साथ ही मंच पर उनका संयमित व्यवहार भी दर्शकों को सहज अनुभव देता रहा। कार्यक्रम के दौरान तालियों और सकारात्मक प्रतिक्रिया से पंडाल में उत्साह बना रहा।
दर्शकों की भागीदारी और प्रतिक्रिया
कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों ने पूरे अनुशासन के साथ प्रस्तुतियों को सुना। हर गीत के बाद तालियों की गूंज सुनाई दी। इसके अलावा, कई दर्शकों को गीतों के साथ हल्की-फुल्की सहभागिता करते हुए भी देखा गया।
पर्यटकों और स्थानीय लोगों के अनुसार, ऐसे कार्यक्रम मेले की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं। वहीं, परिवार के साथ आए दर्शकों ने भी कार्यक्रम को मनोरंजक और यादगार बताया। कार्यक्रम की अवधि के दौरान पंडाल में निरंतर उपस्थिति बनी रही, जो दर्शकों की रुचि को दर्शाता है।
आयोजन की व्यवस्था और प्रबंधन
सांस्कृतिक संध्या का आयोजन सुनियोजित ढंग से किया गया। मंच, ध्वनि व्यवस्था और प्रकाश व्यवस्था को इस प्रकार रखा गया था कि कार्यक्रम स्पष्ट रूप से देखा और सुना जा सके। इसके अलावा, सुरक्षा और बैठने की व्यवस्था भी संतोषजनक रही।
आयोजकों के अनुसार, प्रत्येक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए अलग-अलग विषयों को ध्यान में रखा जाता है। इससे मेले में आने वाले दर्शकों को हर दिन कुछ नया देखने और सुनने को मिलता है। यही कारण है कि सूरजकुंड शिल्प मेला केवल हस्तशिल्प तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करता है।
प्रशासनिक मार्गदर्शन और निरंतर कार्यक्रम
39वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड आत्मनिर्भर शिल्प मेले के दौरान प्रशासनिक स्तर पर भी लगातार निगरानी और मार्गदर्शन किया जा रहा है। अधिकारियों के निर्देशानुसार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाती है, ताकि आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हो सके।
प्रत्येक दिन अलग-अलग सांस्कृतिक गतिविधियों को शामिल किया जा रहा है। इनमें संगीत, नृत्य और लोक कला से जुड़ी प्रस्तुतियां शामिल हैं। इससे न केवल कलाकारों को मंच मिलता है, बल्कि दर्शकों को भी विविध अनुभव प्राप्त होता है।
पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व
सूरजकुंड शिल्प मेला हरियाणा के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आयोजन देश-विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसके साथ ही यह मेला स्थानीय कलाकारों और कारीगरों के लिए भी अवसर प्रदान करता है।
सांस्कृतिक संध्याओं के माध्यम से मेले की पहचान और अधिक व्यापक होती है। संगीत और कला के ऐसे कार्यक्रम पर्यटन को बढ़ावा देने में भी सहायक होते हैं। इसके अलावा, ये कार्यक्रम भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में भी भूमिका निभाते हैं।
आने वाले दिनों के कार्यक्रम
आयोजकों के अनुसार, मेले के शेष दिनों में भी इसी तरह के विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में अलग-अलग राज्यों की लोक कलाओं और संगीत शैलियों को शामिल किया जाएगा।
इससे दर्शकों को भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक ही स्थान पर देखने और समझने का अवसर मिलेगा। साथ ही, कलाकारों को भी व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का मंच प्राप्त होगा।
सूरजकुंड शिल्प मेला और सांस्कृतिक पहचान
सूरजकुंड शिल्प मेला लंबे समय से सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। यहां आयोजित होने वाले कार्यक्रम केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को सामने लाते हैं।
मंगलवार की यह सांस्कृतिक संध्या भी इसी उद्देश्य को दर्शाती है। संगीत के माध्यम से दर्शकों और कलाकारों के बीच संवाद स्थापित हुआ। ऐसे आयोजनों से मेले की गरिमा बनी रहती है और आने वाले वर्षों के लिए इसकी पहचान और मजबूत होती है।

